नाटो शिखर सम्मेलन से पहले ट्रंप ने धमकी दी
अंकारा । डेस्क: इस सप्ताह तुर्किये की राजधानी अंकारा में आयोजित हो रहे दो दिवसीय नाटो (NATO) शिखर सम्मेलन पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं. यूक्रेन युद्ध और ईरान के साथ जारी हालिया तनाव इस बैठक के मुख्य एजेंडे में शामिल हैं. हालांकि, मंगलवार को महासचिव मार्क रुटे के औपचारिक संबोधन से पहले ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक कड़े बयान ने इस ऐतिहासिक बैठक की टोन सेट कर दी है.
ट्रंप ने सोशल मीडिया पर यूरोपीय सहयोगियों की आलोचना करते हुए लिखा कि जब संबंध पारस्परिक नहीं हैं, तो अमेरिका के लिए इस एकतरफा रास्ते पर चलते रहना हास्यास्पद है. उन्होंने बेहद सख्त लहजे में कहा कि जब अमेरिका को जरूरत थी, तब ये देश हमारे साथ खड़े नहीं थे.
32 देशों के इस शक्तिशाली सैन्य गठबंधन के नेताओं का यह जमावड़ा ऐसे समय में हो रहा है, जब अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच दरार खुलकर सामने आ गई है. नाटो के मुताबिक, इस सम्मेलन में मुख्य रूप से तीन प्राथमिकताओं पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा: रक्षा निवेश में बढ़ोतरी, यूरोप के रक्षा औद्योगिक आधार का विस्तार और यूक्रेन के लिए दीर्घकालिक सैन्य सहायता सुनिश्चित करना.
गौरतलब है कि पिछले साल ही सहयोगियों ने रक्षा पर अपनी जीडीपी का पांच प्रतिशत खर्च करने का संकल्प लिया था, जिसके तहत केवल साल 2025 में ही यूरोपीय देशों और कनाडा ने अपने रक्षा बजट में 139 अरब डॉलर की भारी बढ़ोतरी की है.
इसके बावजूद, सम्मेलन में ट्रंप की उस चेतावनी की गूंज सबसे ज्यादा सुनाई दे रही है जिसमें उन्होंने अमेरिका को नाटो से बाहर निकालने और यूरोप से अमेरिकी सैनिकों व हथियारों को हटाने की योजना बनाई है. हाल ही में पेंटागन ने जर्मनी से करीब 5,000 अमेरिकी सैनिकों को वापस बुलाने की घोषणा भी की है.
ईरान के साथ बढ़े हालिया तनाव ने इन मतभेदों को और गहरा कर दिया है, क्योंकि यूरोपीय सहयोगियों ने सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरू मध्य को खोलने के अमेरिकी प्रयासों में सैन्य रूप से शामिल होने से साफ इनकार कर दिया था. इसके अलावा ट्रंप लगातार इस बात पर नाराजगी जता रहे हैं कि वाशिंगटन बिना किसी सीधे लाभ के दूसरों की रक्षा के लिए सबसे ज्यादा पैसा खर्च कर रहा है.
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि हालांकि अमेरिका के रुख में बड़ा बदलाव आया है, लेकिन नाटो से उसका पूरी तरह बाहर निकलना इतना आसान नहीं होगा. इसके लिए ट्रंप को अमेरिकी सीनेट में दो-तिहाई बहुमत या कांग्रेस के विशेष अधिनियम की आवश्यकता होगी, जो फिलहाल नामुमकिन दिखता है क्योंकि दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दलों में नाटो को व्यापक समर्थन प्राप्त है.
साथ ही, अमेरिका में आगामी मध्यावधि चुनाव भी होने वाले हैं जो संसद के नियंत्रण को तय करेंगे.
यूरोपीय थिंक टैंक का कहना है कि अब यूरोप ने अमेरिका के साथ दशकों पुराने भरोसे को पूरी तरह बहाल करने की उम्मीद छोड़ दी है. अब उनकी एकमात्र उम्मीद इस बात को लेकर है कि अमेरिका के इस बदलते रुख के बीच रक्षा व्यवस्था का हस्तांतरण बेहद व्यवस्थित और योजनाबद्ध तरीके से हो, ताकि सुरक्षा तंत्र में कोई बड़ी कमी या गैप न आए.
रूस-यूरेकन युद्ध ने पहले ही यूरोप की रक्षा तैयारियों और अमेरिकी निर्भरता की पोल खोल दी है. यही वजह है कि 2020 से 2025 के बीच यूरोपीय देशों का रक्षा खर्च 62 फीसदी तक बढ़ा है.
फिर भी, यूरोप के सामने आज भी बड़ी चुनौतियां हैं. इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज (IISS) के अनुसार, यूरोपीय देश लंबी दूरी की मारक क्षमता, खुफिया निगरानी, उपग्रह संपत्तियों और मिसाइल रक्षा प्रणाली के लिए पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर हैं.
विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि यूरोप को अमेरिकी सैन्य क्षमताओं की जगह अपनी स्वतंत्र व्यवस्था खड़ी करनी है, तो उसे लगभग 1 ट्रिलियन डॉलर (लाख करोड़) की जरूरत होगी और इस पूरी प्रक्रिया में कम से कम एक दशक या उससे अधिक का समय लग सकता है. यूरोप के लिए मौजूदा हथियारों का उत्पादन तेजी से बढ़ाना और सेना में नई भर्तियां करना भी इस समय एक बड़ा सिरदर्द बना हुआ है.