बंगाल में वोट गिनती को लेकर तृणमूल पहुंची सुप्रीम कोर्ट
कोलकाता | डेस्क: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की मतगणना से ठीक पहले एक अहम कानूनी विवाद सामने आया है, जिसमें ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (AITC) ने सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया का रुख किया है. पार्टी ने कलकत्ता हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें मतगणना के लिए केंद्रीय सरकार और केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों के कर्मचारियों की नियुक्ति को वैध ठहराया गया था और राज्य सरकार के कर्मचारियों को इन भूमिकाओं से बाहर रखने पर कोई आपत्ति नहीं मानी गई थी.
पूरा विवाद उस निर्देश से जुड़ा है, जो पश्चिम बंगाल के अतिरिक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी द्वारा जारी किया गया था. इसमें कहा गया था कि प्रत्येक मतगणना टेबल पर कम से कम एक काउंटिंग सुपरवाइजर या काउंटिंग असिस्टेंट केंद्रीय सरकार या केंद्रीय PSU का कर्मचारी होना चाहिए. AITC ने इस निर्देश का विरोध करते हुए कहा कि ऐसा आदेश जारी करने का अधिकार केवल इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया (ECI) के पास है, न कि अतिरिक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पास.
पार्टी का यह भी तर्क था कि चुनाव आयोग की हैंडबुक में कहीं भी यह अनिवार्य नहीं किया गया है कि इन पदों पर केवल केंद्रीय कर्मचारियों की ही नियुक्ति की जाए. AITC के अनुसार, केवल माइक्रो-ऑब्जर्वर के लिए केंद्रीय कर्मचारियों की शर्त होती है, लेकिन उसे काउंटिंग सुपरवाइजर और असिस्टेंट तक बढ़ाना मनमाना और असंगत है, और यह व्यवस्था केवल पश्चिम बंगाल में लागू की जा रही है, जिससे संदेह पैदा होता है.
पार्टी ने यह आशंका भी जताई कि केंद्रीय कर्मचारियों पर केंद्र सरकार का प्रभाव हो सकता है, जो एक राजनीतिक दल द्वारा संचालित है, और इससे चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है. हालांकि, कलकत्ता हाई कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज कर दिया.
अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग की हैंडबुक के अनुसार काउंटिंग स्टाफ केंद्रीय या राज्य, किसी भी सेवा से लिया जा सकता है, और यह तय करना संबंधित चुनाव अधिकारियों का अधिकार है कि वे किस स्रोत से कर्मचारियों की नियुक्ति करें. कोर्ट ने यह भी माना कि चुनाव आयोग अपने कार्यों का प्रत्यायोजन कर सकता है, इसलिए अतिरिक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी इस तरह का निर्देश जारी करने के लिए सक्षम थे.
पक्षपात की आशंका पर अदालत ने कहा कि मतगणना प्रक्रिया में पहले से ही कई स्तरों पर सुरक्षा और पारदर्शिता के इंतज़ाम मौजूद हैं, जैसे माइक्रो-ऑब्जर्वर की निगरानी, उम्मीदवारों के काउंटिंग एजेंट की मौजूदगी और सीसीटीवी के जरिए पूरी प्रक्रिया की रिकॉर्डिंग.
अदालत के अनुसार केवल आशंका के आधार पर हस्तक्षेप करना उचित नहीं है, खासकर तब जब आरोपों को ठोस आधार नहीं मिला हो. साथ ही, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी पक्ष को मतगणना प्रक्रिया को लेकर कोई वास्तविक शिकायत होती है, तो उसे चुनाव याचिका के माध्यम से उठाया जा सकता है.
हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान न्यायिक हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए और अदालतों को संयम बरतना चाहिए. इस मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि पहले भी चुनाव प्रक्रिया से जुड़े आदेशों को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज की जा चुकी हैं.
उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी, जहां विशेष अनुमति याचिका (SLP) खारिज कर दी गई थी, हालांकि कानूनी प्रश्न को खुला रखा गया था. इसी आधार पर हाई कोर्ट ने कहा कि वह उसी प्रश्न पर फिर से निर्णय नहीं दे सकता और उचित समय पर इस पर फैसला करना सुप्रीम कोर्ट का अधिकार होगा.
इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए हाई कोर्ट ने AITC की याचिका खारिज कर दी. अब AITC ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में अपील दायर की है और तत्काल सुनवाई की मांग की है, क्योंकि मतगणना 4 मई को होने वाली है.