गजा में बमबारी के खौफ से हजारों बच्चों की छिन गई जुबान
गजा । डेस्क: गजा पट्टी में चल रहे भीषण संघर्ष के बीच एक रूह कंपा देने वाली सच्चाई सामने आ रही है. यहां बच्चे न केवल शारीरिक चोटों का शिकार हो रहे हैं, बल्कि युद्ध के भयावह दृश्यों और लगातार होती बमबारी ने उनसे उनकी बोलने की क्षमता तक छीन ली है. पांच साल के जद ज़ुहुद की कहानी इसका एक दर्दनाक उदाहरण है. एक भीषण बमबारी के बाद जब जद की नींद खुली, तो वह पूरी तरह खामोश हो चुका था. वह चाहकर भी कोई शब्द नहीं बोल पा रहा था.
चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, यह समस्या गजा के हजारों बच्चों में तेजी से फैल रही है, जिसे डॉक्टर 'साइलेंट सफरिंग' या मौन पीड़ा का नाम दे रहे हैं. गजा सिटी के हमद अस्पताल के स्पीच विभाग के प्रमुख डॉ. मूसा अल-खोरती बताते हैं कि अस्पताल में बोलने की क्षमता खोने वाले बच्चों के मामलों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है.
इनमें से कई बच्चे 'सेलेक्टिव म्यूटिज्म' या 'हिस्टेरिकल एफोनिया' जैसी स्थितियों से जूझ रहे हैं. यह एक ऐसी स्थिति है जहां अत्यधिक मानसिक तनाव या सदमे के कारण व्यक्ति की आवाज पूरी तरह चली जाती है.
डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (MSF) के साथ काम कर चुकीं बाल मनोचिकित्सक कैटरीन ग्लैत्ज़ ब्रूबक का कहना है कि यह बच्चों के शरीर की एक स्वाभाविक रक्षा प्रणाली है, जिसे 'फ्रीज रिस्पॉन्स' कहा जाता है. जब कोई बच्चा अपने परिवार के सदस्यों को खोते हुए देखता है या मौत को करीब से महसूस करता है, तो उसका दिमाग इस भारी सदमे को प्रोसेस नहीं कर पाता. ऐसे में बच्चा पूरी तरह खामोश हो जाता है क्योंकि उसे लगता है कि स्थिर और शांत रहना ही सुरक्षा का एकमात्र तरीका है.
ब्रूबक के अनुसार, गजा में सुरक्षा का कोई भी कोना नहीं बचा है और यही निरंतर असुरक्षा बच्चों के तंत्रिका तंत्र को 'हाई अलर्ट' पर रखती है. इससे न केवल उनकी आवाज प्रभावित हो रही है, बल्कि उनके सीखने और बढ़ने की क्षमता यानी संज्ञानात्मक विकास पर भी 'युद्ध की चोट' लग रही है.
चार साल की लुसीन ताम्बौरा की स्थिति भी जद जैसी ही है. एक हवाई हमले में क्षतिग्रस्त हुई सीढ़ियों से गिरने के बाद उसे आंशिक लकवा मार गया था. हालांकि वह शारीरिक रूप से ठीक हो गई, लेकिन उसकी आवाज अब भी नहीं लौटी है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन बच्चों को तुरंत और निरंतर मनोवैज्ञानिक उपचार नहीं मिला, तो इसके दूरगामी परिणाम होंगे.
गजा में स्वास्थ्य सेवाओं का पूरी तरह चरमरा जाना इस संकट को और भी गंभीर बना रहा है. डॉक्टरों के पास वे विशेष उपकरण और शांतिपूर्ण वातावरण नहीं है जो इन बच्चों के पुनर्वास के लिए आवश्यक हैं. हालांकि, कठिन परिस्थितियों के बावजूद कुछ छोटे प्रयासों से उम्मीद की किरण दिखाई देती है.
थेरेपी के दौरान साबुन के बुलबुलों का उपयोग किया जा रहा है ताकि बच्चों का ध्यान डर से हटाकर जिज्ञासा की ओर मोड़ा जा सके. धीरे-धीरे सांस लेने की यह प्रक्रिया उनके तंत्रिका तंत्र को शांत करने में मदद करती है. एडम जैसे कुछ बच्चों ने लंबी खामोशी के बाद धीरे से फुसफुसाना शुरू किया है, जो इस बात का संकेत है कि धैर्य और देखभाल से यह 'मौन' टूट सकता है. लेकिन जब तक गजा में धमाके नहीं रुकते, तब तक इन मासूमों के लिए सुरक्षा और सामान्य जीवन एक अधूरा सपना ही बना रहेगा.