तमनार : लोकतंत्र की कसौटी और शर्मशार समाज
आलोक शुक्ला
छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के तमनार क्षेत्र में महिला आरक्षक के साथ घटित घटना घोर निंदनीय, अमानवीय और पूरे प्रदेश को शर्मसार करने वाली है. किसी भी प्रकार का आंदोलन, चाहे वह कितना ही न्यायसंगत क्यों न हो, महिलाओं के विरुद्ध हिंसा को कभी भी उचित नहीं ठहराया जा सकता. आंदोलन की आड़ में इस शर्मनाक कृत्य को अंजाम देने वाले अपराधियों पर कठोरतम कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि छत्तीसगढ़ में भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो और कानून के प्रति विश्वास बहाल हो सके.
महिला आरक्षक के साथ हुई घटना केवल अप्रिय या दुर्भाग्यपूर्ण नहीं कही जा सकती. उसके कपड़े फाड़े जाना, भीड़ द्वारा शारीरिक अपमान किया जाना, एक महिला को उसकी गरिमा से वंचित करने का सुनियोजित और घृणित प्रयास है. यह कृत्य सीधे-सीधे महिला की अस्मिता, सम्मान और मानवाधिकारों पर हमला है. छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में, जहाँ आदिवासी और ग्रामीण समाज ने परंपरागत रूप से महिलाओं को सम्मान की दृष्टि से देखा है, ऐसी घटना पूरे सामाजिक ताने-बाने पर एक कलंक है. यह स्पष्ट रूप से कहा जाना चाहिए कि इस प्रकार का कृत्य किसी भी आंदोलन, किसी भी जनसंघर्ष और किसी भी वैचारिक मतभेद से ऊपर अपराध है, और इसे किसी भी तर्क, भावना या उकसावे के नाम पर जायज़ ठहराने की कोशिश स्वयं अपराध में भागीदारी के समान होगी.
यह भी उतना ही आवश्यक है कि छत्तीसगढ़ की राज्य सरकार, पुलिस प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व इस मुद्दे पर दो टूक और बिना किसी किंतु-परंतु के अपना रुख स्पष्ट करे. महिला आरक्षक के कपड़े फाड़े जाने की घटना पर यदि सख्त, उदाहरण प्रस्तुत करने वाली कार्रवाई नहीं होती, तो यह संदेश जाएगा कि भीड़ की हिंसा और स्त्री-अपमान को सत्ता की मौन स्वीकृति प्राप्त है. यह स्थिति न केवल पुलिस बल में कार्यरत महिलाओं के मनोबल को तोड़ेगी, बल्कि छत्तीसगढ़ में कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा की पूरी अवधारणा को कमजोर कर देगी.
लेकिन इस घटना को केवल एक आपराधिक कृत्य मानकर समाप्त कर देना न तो न्यायपूर्ण होगा और न ही विवेकपूर्ण. इसके समानांतर कुछ गंभीर प्रश्न हैं, जिनके उत्तर छत्तीसगढ़ की जनता प्रशासन और राज्य सरकार से अपेक्षित कर रही है. जिस दिन तमनार में यह अप्रिय, तनावपूर्ण और अंततः हिंसक स्थिति बनी, उसकी वास्तविक जिम्मेदारी आखिर किसकी थी? क्या रायगढ़ का जिला प्रशासन और पुलिस तंत्र यह स्पष्ट करने के लिए बाध्य नहीं हैं कि आंदोलन स्थल पर अचानक जिंदल कंपनी के कोयला परिवहन को जबरन शुरू करवाने का निर्णय किस स्तर पर लिया गया? क्या यह निर्णय लिखित था, और क्या इसके संभावित परिणामों का कोई आकलन किया गया था?
8 दिसंबर को धौराभाटा में, हजारों ग्रामीणों की मौजूदगी के बावजूद, प्रशासन ने कॉर्पोरेट दबाव में एक अविवेकपूर्ण निर्णय लेते हुए जिंदल कंपनी के कर्मचारियों को बुलाकर जनसुनवाई संपन्न करा दी. यह छत्तीसगढ़ के लोकतांत्रिक इतिहास का एक चिंताजनक उदाहरण है. यदि ग्रामीणों के आंदोलन में कहीं भी हिंसा की जगह होती तो उसी दिन यह आंदोलन हिंसक रूप ले सकता था, लेकिन उन्होंने संयम और परिपक्वता का परिचय देते हुए गांधीवादी और शांतिपूर्ण मार्ग को चुना.
वीडियो साक्ष्यों में यह स्पष्ट देखा जा सकता है कि पुलिस की मौजूदगी में स्थानीय विधायक तक जनसुनवाई स्थल पर जाने की अनुमति के लिए विनती करती नजर आ रही थीं, जबकि वहीं विधि-विरुद्ध तरीके से कार्यवाही संपन्न की जा रही थी.
इसके बाद 27 दिसंबर को जिस दिन हिंसा भड़की, उससे पहले लगभग बीस दिनों तक, 14 गांवों के हजारों ग्रामीण अनिश्चितकालीन धरने पर शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक ढंग से बैठे रहे. छत्तीसगढ़ की धरती पर इतने लंबे समय तक चले इस आंदोलन के दौरान एक भी दिन कोई अप्रिय घटना नहीं घटी. फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि पुलिस को यह विश्वास हो गया कि लाठी के बल पर सड़क खाली कराकर जिंदल कंपनी के कोयला परिवहन को सुचारू कराया जा सकता है? क्यों उसी सुबह से ग्रामीणों की गिरफ्तारियाँ शुरू कर दी गईं?
यह प्रश्न भी अत्यंत गंभीर है कि क्या यह निर्णय राजधानी रायपुर में बैठी राज्य सरकार के स्तर पर लिया गया था, जहाँ ग्रामीणों की मांगों को अनसुना कर दमन के रास्ते आंदोलन समाप्त करने की रणनीति बनी या फिर यह रायगढ़ में मौजूद किसी मंत्री अथवा वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों का परिणाम था?
अनिश्चितकालीन आंदोलन के बावजूद कोयला परिवहन को जबरन शुरू करवाना, व्यापक गिरफ्तारियाँ करना और अंततः कोयला परिवहन ट्रक से कुचलकर एक ग्रामीण की मौत, इन सभी घटनाओं ने मिलकर उस हिंसा को जन्म दिया, जिसने छत्तीसगढ़ की कानून-व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं.
आज छत्तीसगढ़ में पुलिस तंत्र को लेकर आम जनता, विशेषकर ग्रामीण और आदिवासी समुदायों में, गहरा अविश्वास पनप चुका है. यह धारणा मजबूत हो रही है कि पुलिस कानून के निष्पक्ष पालन के बजाय बड़े पूंजीपतियों के हितों में जंगल और जमीन खाली कराने का माध्यम बनती जा रही है.
हसदेव अरण्य में अदानी समूह के लिए जंगलों की कटाई के दौरान पुलिस की भूमिका पूरे देश ने देखी है. हसदेव में ग्रामीणों ने भी सार्वजनिक मंचों से आरोप लगाए थे कि कैसे उन पर पेट्रोल बम फेंके गए, और ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में भरकर पत्थर लाए गए, ग्रामीणों पर पथराव किया गया, जिनमें कंपनी से जुड़े लोगों की संलिप्तता की बात सामने आई थी.
छत्तीसगढ़ पुलिस और राज्य प्रशासन को यह आत्ममंथन करना होगा कि कहीं कुछ अधिकारियों की कॉर्पोरेट-परस्ती पूरी वर्दी और संस्था की साख को अपूरणीय क्षति तो नहीं पहुँचा रही है. अंततः, उस महिला आरक्षक बहन को न्याय मिले, इस अपेक्षा के साथ दोषियों पर कठोरतम कार्रवाई अनिवार्य है.
तमनार की यह घटना केवल एक स्थान या एक दिन की कहानी नहीं है; यह छत्तीसगढ़ में लोकतंत्र, आदिवासी-ग्रामीण अधिकारों और राज्य की प्राथमिकताओं की एक कठोर परीक्षा है. यह उन सभी लोगों के लिए एक चेतावनी भी है, जो अपने जंगल, जमीन और अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
*लेखक छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक हैं.