हत्या की स्वीकारोक्ति FIR दोषसिद्धि का आधार नहीं- SC
नई दिल्ली । डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के एक व्यक्ति की 2019 के हत्या मामले में दोषसिद्धि को रद्द करते हुए कहा कि एक आरोपी द्वारा दर्ज कराई गई स्वीकारोक्ति प्रकृति की प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) का उपयोग उसके खिलाफ साक्ष्य के रूप में केवल बहुत सीमित उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है.
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और आर. महादेवन की पीठ ने कहा, “आरोपी द्वारा दर्ज की गई स्वीकारोक्ति प्रकृति की FIR उसके खिलाफ साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं है, सिवाय इसके कि यह दिखाए कि अपराध के तुरंत बाद उसने बयान दिया था, जिससे उसे रिपोर्ट दर्ज करने वाले के रूप में पहचाना जा सके. यह 1872 के साक्ष्य अधिनियम की धारा 8 के तहत उसके आचरण के साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य है. इसके अतिरिक्त, उसके द्वारा दी गई कोई भी जानकारी जो किसी तथ्य की खोज की ओर ले जाती है, वह धारा 27 के तहत स्वीकार्य है. हालांकि, गैर-स्वीकारोक्ति FIR को धारा 21 के तहत स्वीकारोक्ति के रूप में आरोपी के खिलाफ स्वीकार्य माना जाता है और यह प्रासंगिक है.”
कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट को मेडिकल साक्ष्य को स्वीकारोक्ति FIR के हिस्से से पुष्टि करने की कोई आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि साक्ष्य अधिनियम की धारा 25 पुलिस अधिकारी को दी गई ऐसी स्वीकारोक्तियों के उपयोग पर रोक लगाती है.
यह फैसला छत्तीसगढ़ के नारायण यादव की अपील पर आया, जिन्होंने सितंबर 2019 में पुलिस को सूचित किया था कि उन्होंने नशे में हुई झड़प के बाद अपने दोस्त राम बाबू शर्मा की हत्या कर दी थी. हाई कोर्ट ने उनकी दोषसिद्धि को हत्या (IPC धारा 302) से बदलकर गैर-इरादतन हत्या (IPC धारा 304 भाग I) कर दिया था, जिसमें IPC धारा 300 के अपवाद 4 का उपयोग किया गया था.
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि “मृतक निहत्था था, यह दो व्यक्तियों के बीच आपसी लड़ाई का मामला नहीं था जो अपवाद 4 के दायरे में आता. मृतक पूरी तरह से निहत्था था जब आरोपी ने उसके शरीर पर अंधाधुंध चोटें पहुंचाईं.”
पीठ ने मेडिकल राय की सीमाओं पर भी जोर दिया, “केवल मेडिकल साक्ष्य के आधार पर आरोपी को हत्या के अपराध का दोषी नहीं ठहराया जा सकता. एक डॉक्टर तथ्य का गवाह नहीं होता… ऐसे विशेषज्ञ का साक्ष्य सलाहकारी प्रकृति का होता है.”
कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी का आचरण साक्ष्य अधिनियम की धारा 8 के तहत प्रासंगिक हो सकता है, लेकिन “यह अपने आप में, विशेष रूप से हत्या जैसे गंभीर आरोप में, दोषसिद्धि का एकमात्र आधार नहीं हो सकता.”
अपने निष्कर्षों के समर्थन में, पीठ ने निसार अली बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (AIR 1957 SC 366), फद्दी बनाम मध्य प्रदेश राज्य (AIR 1964 SC 1850) और अगनू नागेसिया बनाम बिहार राज्य (AIR 1966 SC 119) का उल्लेख किया, जो सामूहिक रूप से स्थापित करते हैं कि स्वीकारोक्ति FIR इसके निर्माता के खिलाफ स्वीकार्य नहीं है और इसे स्वीकार्य और अस्वीकार्य हिस्सों में विभाजित नहीं किया जा सकता. इसके अलावा, ए.एन. वेंकटेश बनाम कर्नाटक राज्य (2005) 7 SCC 714 का हवाला दिया गया, जो धारा 8 के तहत आचरण की प्रासंगिकता पर है.
अपील को स्वीकार करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता को सभी आरोपों से बरी कर दिया और यदि किसी अन्य मामले में आवश्यक न हो तो उसे रिहा करने का आदेश दिया.