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शेख हसीना-कमाल को मौत की सजा, प्रत्यार्पण की मांग, MEA ने नोटिस लिया

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17 नव. 2025, 02:51 PM 5 मिनट में पढ़ें 1

शेख हसीना
शेख हसीना

नई दिल्ली । डेस्क: बांग्लादेश के अंतर्राष्ट्रीय अपराध ट्रिब्यूनल-1 ने सोमवार को एक ऐतिहासिक और विवादास्पद फैसला सुनाते हुए पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना और पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमान खान कमाल को 2024 के जुलाई-अगस्त महीनों में छात्र आंदोलन के खिलाफ क्रूर दमन के दौरान मानवता के खिलाफ अपराधों और नरसंहार के आरोप में मौत की सजा सुनाई. ट्रिब्यूनल ने दोनों फरार नेताओं को फांसी की सजा का आदेश जारी किया, जो बांग्लादेश की राजनीतिक अस्थिरता को एक नया मोड़ दे सकता है. 


इसी मामले में पूर्व पुलिस महानिदेशक चौधरी अब्दुल्लाह अल-मामून, जो अदालत में राज्य गवाह बन चुके थे और हसीना तथा कमाल के खिलाफ गवाही दे चुके थे, को अपराध में अपनी संलिप्तता कबूल करने पर पांच साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई. फैसले के बाद बांग्लादेश में सुरक्षा व्यवस्था हाई अलर्ट पर है, जबकि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय इस पर कड़ी नजर रखे हुए है.

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यह फैसला बांग्लादेश की राजनीति में एक बड़ा भूकंप पैदा कर सकता है, क्योंकि शेख हसीना, जो 2009 से 2024 तक 15 वर्षों तक प्रधानमंत्री रहीं, को उनके समर्थक अभी भी एक मजबूत नेता के रूप में देखते हैं. 2024 के ग्रीष्मकालीन महीनों में शुरू हुए छात्र आंदोलन ने हसीना सरकार को जड़ से हिला दिया था. शुरुआत में नौकरी कोटा सुधार की मांग से चले इस आंदोलन ने जल्द ही पूरे देश में फैलाव कर लिया, जिसमें प्रदर्शनकारियों पर पुलिस और सुरक्षा बलों की कथित ब्रूटल कार्रवाई शामिल थी. 


आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इन हिंसाओं में कम से कम 200 से अधिक लोग मारे गए, जबकि मानवाधिकार संगठनों ने मृतकों की संख्या को 1,000 से अधिक बताते हुए सरकार पर अत्यधिक बल प्रयोग का आरोप लगाया. ट्रिब्यूनल ने हसीना और कमाल को इस दमन की मुख्य साजिशकर्ता माना, जिसमें चार मामलों में मानवता के खिलाफ अपराध साबित हुए. कमाल, जो गृह मंत्रालय संभालते हुए सुरक्षा बलों का नेतृत्व कर रहे थे, को विशेष रूप से जिम्मेदार ठहराया गया.


फैसले के तुरंत बाद, हसीना ने भारत से जारी एक बयान में इसे पूरी तरह से अस्वीकार कर दिया. बांग्लादेश अवामी लीग के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से साझा किए गए उनके बयान में पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा, "ये फैसले एक कठपुतली ट्रिब्यूनल द्वारा दिए गए हैं, जिसे गैर-निर्वाचित और अस्थिर सरकार ने स्थापित किया है. इसमें कोई लोकतांत्रिक वैधता नहीं है. ये पक्षपाती, राजनीतिक रूप से प्रेरित और बदले की भावना से भरे हुए हैं." 


हसीना ने आगे कहा, "हमने स्थिति पर नियंत्रण खो दिया था, लेकिन इसे नागरिकों पर पूर्वनियोजित हमला नहीं कहा जा सकता. आंदोलन के दौरान हुई हिंसा दुखद थी, लेकिन जिम्मेदारी केवल एक पक्ष की नहीं है." उनके समर्थकों का मानना है कि यह फैसला नई अंतरिम सरकार की ओर से राजनीतिक प्रतिशोध का हिस्सा है, जो हसीना के सत्ता से हटने के बाद सत्ता में आई है. अवामी लीग ने इसे "काला अध्याय" बताते हुए अंतरराष्ट्रीय अदालतों में अपील करने की योजना बनाई है.


दूसरी ओर, बांग्लादेश की वर्तमान अंतरिम सरकार ने फैसले का स्वागत किया है. विदेश मंत्रालय ने सोमवार को एक बयान जारी कर भारत से दोनों फरार नेताओं को तत्काल प्रत्यर्पित करने की अपील की. मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, "भारत और बांग्लादेश के बीच 2013 में हस्ताक्षरित प्रत्यर्पण संधि के तहत नई दिल्ली बाध्य है कि वह हसीना और कमाल को सौंपे. ये दोनों व्यक्ति छात्र विद्रोह के खिलाफ क्रूर दमन के मुख्य आरोपी हैं, और न्याय की खातिर उनका प्रत्यर्पण अनिवार्य है." 


हसीना पिछले साल अगस्त में हिंसक प्रदर्शनों के दौरान देश छोड़कर भारत पहुंची थीं, जहां वे दिल्ली में रह रही हैं. कमाल भी फरार हैं, और उनकी लोकेशन अज्ञात बताई जा रही है. बांग्लादेश सरकार का दावा है कि प्रत्यर्पण न होने पर द्विपक्षीय संबंधों पर असर पड़ेगा, लेकिन भारत ने अभी तक कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं दी है.


भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने फैसले पर संयमित प्रतिक्रिया दी है. MEA के आधिकारिक प्रवक्ता ने कहा, "भारतीय सरकार ने बांग्लादेश के अंतर्राष्ट्रीय अपराध ट्रिब्यूनल द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के खिलाफ सुनाए गए फैसले पर नोटिस लिया है. हम बांग्लादेश के लोगों के सर्वोत्तम हितों के प्रति प्रतिबद्ध हैं, जिसमें शांति, लोकतंत्र, समावेशिता और स्थिरता सुनिश्चित करना शामिल है. हम सभी हितधारकों के साथ रचनात्मक संवाद जारी रखेंगे." 


MEA ने प्रत्यर्पण की मांग पर सीधे टिप्पणी करने से परहेज किया, लेकिन सूत्रों के अनुसार, भारत हसीना को राजनीतिक शरण दे चुका है और संधि के प्रावधानों के तहत फैसले की वैधता की समीक्षा करेगा. भारत-बांग्लादेश संबंधों को देखते हुए, यह मुद्दा संवेदनशील है, क्योंकि हसीना के कार्यकाल में दोनों देशों के बीच व्यापार, सीमा सुरक्षा और कनेक्टिविटी परियोजनाओं में मजबूती आई थी.


अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिक्रियाएं तेज हैं. संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह "न्याय का महत्वपूर्ण कदम" है, लेकिन साथ ही ट्रायल की निष्पक्षता पर सवाल उठाए. यूरोपीय संघ और अमेरिका ने बांग्लादेश से अपील की है कि वह सभी पक्षों को न्याय का अवसर दे. ह्यूमन राइट्स वॉच जैसे संगठनों ने दोनों पक्षों पर हिंसा के आरोप लगाते हुए स्वतंत्र जांच की मांग की है. भारत में, विपक्षी दलों ने MEA की प्रतिक्रिया को "दोहरावपूर्ण" बताते हुए सरकार से अधिक स्पष्ट रुख अपनाने की मांग की है.


फैसले के बाद ढाका और अन्य प्रमुख शहरों में सुरक्षा बल तैनात हैं, क्योंकि अवामी लीग समर्थकों द्वारा विरोध प्रदर्शनों की आशंका है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना बांग्लादेश की राजनीति को लंबे समय तक प्रभावित करेगी, खासकर आगामी चुनावों के संदर्भ में. हसीना की अनुपस्थिति में नई सरकार को स्थिरता बनाए रखने की चुनौती है, जबकि भारत जैसे पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को संतुलित करना होगा. कुल मिलाकर, यह फैसला न केवल व्यक्तिगत न्याय का सवाल है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता का भी मुद्दा बन चुका है. बांग्लादेश में जारी राजनीतिक उथल-पुथल के बीच, दुनिया की नजरें अब भारत की अगली प्रतिक्रिया पर टिकी हैं.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP