ईरान में महंगाई का तांडव: खाद्य संकट और युद्ध के बीच पिसती जनता
तेहरान । डेस्क: ईरान इस समय अपने इतिहास के सबसे गंभीर आर्थिक और सामाजिक संकट से गुजर रहा है. अमेरिका और इजरायल के साथ जारी सैन्य संघर्ष और कड़े नौसैनिक अवरोधों के बीच देश में मुद्रास्फीति (महंगाई) ने आसमान छू लिया है. सांख्यिकी केंद्र ईरान (SCI) द्वारा जारी ताजा आंकड़ों ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है. ईरान के नए फारसी कैलेंडर वर्ष के पहले महीने 'फरवरदीन' में वार्षिक मुद्रास्फीति की दर 73.5 प्रतिशत दर्ज की गई है. लेकिन इससे भी भयावह स्थिति खाद्य पदार्थों की कीमतों में देखी जा रही है, जहाँ महंगाई दर 115 प्रतिशत तक पहुँच गई है.
इसका सीधा मतलब यह है कि ईरानी परिवारों को पिछले साल की तुलना में बुनियादी राशन के लिए दोगुने से भी अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है. स्थिति इतनी विकट है कि ठोस वनस्पति तेल की कीमतों में 375 प्रतिशत और खाना पकाने के तेल में 308 प्रतिशत की भारी वृद्धि हुई है. चावल, चिकन और मांस जैसी आवश्यक वस्तुएं अब आम आदमी की थाली से गायब होती जा रही हैं.
राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने रविवार को देश की स्थिति पर चर्चा करते हुए जनता से "वास्तविक परिस्थितियों को समझने" और सहयोग करने की अपील की है. उन्होंने स्वीकार किया कि युद्ध और बाहरी प्रतिबंधों के कारण देश कठिन दौर से गुजर रहा है, लेकिन उन्होंने राष्ट्रीय एकता के माध्यम से इन समस्याओं को हल करने का भरोसा जताया है.
हालांकि, जमीन पर हालात इसके विपरीत हैं. तेहरान की सड़कों पर आम नागरिक अपनी बेबसी जाहिर कर रहे हैं. लोगों का कहना है कि उनकी तनख्वाह का एक बड़ा हिस्सा अब केवल भोजन जुटाने में ही खत्म हो जाता है. स्थानीय बाजारों में रियाल की कीमत में भारी गिरावट आई है. अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रियाल अब 1.77 मिलियन के सर्वकालिक निचले स्तर पर पहुंच गया है, जो एक साल पहले लगभग 830,000 था.
सरकार ने इस संकट से निपटने के लिए नकद सब्सिडी और इलेक्ट्रॉनिक वाउचर देने की घोषणा की है, लेकिन प्रति व्यक्ति 10 डॉलर से भी कम की यह सहायता ऊंट के मुंह में जीरे के समान है. बजट की कमी के कारण इस राशि को बढ़ाना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है.
दूसरी ओर, ईरान के कट्टरपंथी धड़े और सरकारी मीडिया इन बढ़ती कीमतों को "दुश्मन की साजिश" और "आर्थिक प्रतिशोध" करार दे रहे हैं. उनका तर्क है कि युद्ध के मैदान में विफल होने के बाद बाहरी ताकतें देश के भीतर आर्थिक अस्थिरता पैदा कर रही हैं.
इस बीच, देश में पिछले 72 दिनों से जारी इंटरनेट ब्लैकआउट ने व्यापारिक और स्टार्टअप इकोसिस्टम को पूरी तरह से तबाह कर दिया है. स्टार्टअप जगत से जुड़े संगठनों का कहना है कि देश में डिजिटल अर्थव्यवस्था अब अंतिम सांसे ले रही है. कुल मिलाकर, स्थानीय कुप्रबंधन, पश्चिमी प्रतिबंधों, युद्ध और इंटरनेट बंदी के घातक संयोजन ने ईरानी समाज को एक ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया है जहाँ भविष्य की राह धुंधली नजर आती है.