राष्ट्रपति ट्रंप ने अपनी ही सरकार के खिलाफ मुकदमा दायर किया !
वॉशिंगटन । डेस्क: अमेरिकी राजनीति के इतिहास में एक ऐसा मोड़ आया है जिसने कानूनी विशेषज्ञों और संविधान के जानकारों को हैरत में डाल दिया है. डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति पद पर वापसी के बाद एक ऐसा कदम उठाया है जो इससे पहले किसी भी मौजूदा राष्ट्रपति ने नहीं किया उन्होंने अपनी ही सरकार के खिलाफ मुकदमा दायर कर दिया है. यह कानूनी लड़ाई केवल प्रक्रियात्मक नहीं है, बल्कि इसमें $10 बिलियन (लगभग 84,000 करोड़ रुपये) की भारी-भरकम राशि की मांग की गई है.
इस मामले ने न केवल अदालतों के सामने एक नया संकट खड़ा कर दिया है, बल्कि इसने 'हितों के टकराव' और 'संवैधानिक मर्यादा' जैसी गंभीर बहसों को भी जन्म दे दिया है.
इस पूरे विवाद की जड़ें साल 2017 में तब जमी थीं, जब चार्ल्स "चेज़" लिटिलजॉन नामक एक सरकारी ठेकेदार ने ट्रंप के टैक्स रिटर्न चोरी कर लिए थे. उस समय ट्रंप ने अपनी संपत्ति और करों के विवरण को सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया था, जो दशकों से अमेरिकी राष्ट्रपतियों द्वारा निभाई जा रही एक परंपरा रही है. लिटिलजॉन ने इन दस्तावेजों को 'न्यूयॉर्क टाइम्स' और 'प्रो-पब्लिका' जैसे मीडिया संस्थानों को लीक कर दिया.
इसके बाद छपी रिपोर्टों ने दावा किया कि ट्रंप ने पिछले 15 वर्षों में से कई सालों तक कोई संघीय आयकर नहीं चुकाया था. अब ट्रंप का तर्क है कि इस लीक के कारण उनकी और उनके व्यवसायों की छवि को "अपूरणीय क्षति" हुई है, जिसके लिए ट्रेजरी विभाग और आईआरएस (IRS) जिम्मेदार हैं. हालांकि लिटिलजॉन जेल में हैं, लेकिन ट्रंप चाहते हैं कि सरकार उन्हें इस लापरवाही के लिए हर्जाना दे.
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, इस मामले का सबसे जटिल हिस्सा यह है कि ट्रंप अब खुद उस सरकार के प्रमुख हैं जिससे वह पैसा मांग रहे हैं. अमेरिका के न्याय विभाग (DOJ) की जिम्मेदारी सरकार का बचाव करना है, लेकिन वर्तमान अटॉर्नी जनरल पाम बोंडी ट्रंप की करीबी सहयोगी मानी जाती हैं. ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या न्याय विभाग पूरी निष्पक्षता से इस मुकदमे को लड़ेगा या फिर ट्रंप के पक्ष में एक बड़ा समझौता कर लेगा.
कॉमन कॉज जैसे निगरानी संगठनों का कहना है कि यह "राजकोष की लूट" जैसा हो सकता है, जहाँ राष्ट्रपति खुद अपने अधीन काम करने वाली एजेंसियों से पैसा वसूलने की बातचीत करेंगे. संवैधानिक विशेषज्ञ निकेल सुस के अनुसार, अमेरिकी संविधान का 'इमॉल्यूमेंट्स क्लॉज' राष्ट्रपति को वेतन के अलावा सरकार से किसी भी प्रकार का अतिरिक्त लाभ लेने से रोकता है. यदि ट्रंप यह केस जीतते हैं या समझौता करते हैं, तो यह सीधे तौर पर संविधान का उल्लंघन होगा.
ट्रंप ने इस आलोचना के जवाब में संकेत दिया है कि वे समझौते की राशि को चैरिटी में दान कर सकते हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इससे कानूनी स्थिति नहीं बदलती. दान का निर्णय भी राष्ट्रपति का व्यक्तिगत प्रभाव बढ़ाएगा, जो एक अप्रत्यक्ष लाभ ही माना जाएगा.
इसके अलावा, मुकदमे की तकनीकी खामियां भी ट्रंप के लिए मुश्किलें पैदा कर सकती हैं. कानून के तहत ऐसे मामलों में दो साल की समय सीमा (Statute of Limitations) होती है. ट्रंप के विरोधियों का तर्क है कि उन्हें 2020 में ही लीक का पता चल गया था, इसलिए अब मुकदमा दायर करने का समय निकल चुका है. साथ ही, $10 बिलियन की राशि की गणना को भी विशेषज्ञ "तर्कहीन" बता रहे हैं, क्योंकि आमतौर पर ऐसे उल्लंघनों के लिए हर्जाना बहुत कम होता है.
इस कानूनी खींचतान के बीच डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने एक नया मोर्चा खोल दिया है. सीनेटर रॉन वाइडन और चक शूमर ने एक विधेयक पेश किया है, जिसमें प्रस्ताव है कि यदि कोई मौजूदा राष्ट्रपति अपनी ही सरकार से समझौता कर पैसा जीतता है, तो उस पर 100 प्रतिशत टैक्स लगाया जाए.
हालांकि रिपब्लिकन बहुमत वाली कांग्रेस में इस बिल का पास होना कठिन है, लेकिन इसने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है.
अब पूरी दुनिया की नजरें फ्लोरिडा की उस अदालत पर हैं, जिसे यह तय करना है कि क्या यह मुकदमा आगे चलेगा या इसे राष्ट्रपति के पद छोड़ने तक स्थगित कर दिया जाएगा. यह फैसला न केवल ट्रंप के भविष्य के लिए अहम है, बल्कि यह भी तय करेगा कि क्या भविष्य में कोई भी राष्ट्रपति अपनी शक्तियों का उपयोग सरकारी खजाने को निजी लाभ के लिए इस्तेमाल करने में कर पाएगा या नहीं.