भारत में जहरीली हो रही है खेती की ज़मीन
छत्तीसगढ़ जहरीली होती कृषि भूमि भारत के लिए बड़ा खतरा
नई दिल्ली | डेस्क: मिट्टी हमारे जीवन का आधार है. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि मिट्टी की ऊपरी परत के केवल कुछ सेंटीमीटर हिस्से के निर्मित होने में करीब एक हजार से अधिक वर्ष का समय लगता है.
वहीं मनुष्य जिस तेज गति से मिट्टी का दोहन कर रहा है, उसके कारण हर पांच सेकंड में धरती पर एक फुटबॉल पिच के बराबर मिट्टी नष्ट हो रही है.
मिट्टी नष्ट ही नहीं हो रही है, बल्कि जो बची है वह तेजी से प्रदूषित भी हो रही है. दुनिया की करीब 16 फीसदी कृषि भूमि जहरीली भारी धातुओं (हैवी मैटल्स) की वजह से प्रदूषित हो चुकी है.
जिसके कारण 140 करोड़ लोगों के स्वास्थ्य को लेकर गंभीर संकट पैदा हो गया है.
करीब 24.2 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र ऐसा है, जहां मिट्टी में जहरीली धातुओं का स्तर सामान्य से कहीं ज्यादा है.
सबसे अधिक खतरे वाले क्षेत्रों में दक्षिणी चीन, उत्तरी और मध्य भारत और मध्य पूर्व के हिस्से शामिल हैं. जहां की मिट्टी में भारी धातुओं की मात्रा पहले से ही बहुत अधिक है.
यह अध्ययन चीन, अमेरिका और ब्रिटिश वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है, जिसके नतीजे अंतराष्ट्रीय जर्नल साइंस में प्रकाशित हुए हैं.
भारी धातुएं यानी हैवी मैटल्स वे तत्व होते हैं, जो प्राकृतिक या मानव-निर्मित स्रोतों से उत्पन्न होते हैं. इन्हें भारी इसलिए कहते हैं क्योंकि इन धातुओं का घनत्व परमाणु स्तर पर बहुत अधिक होता है. मतलब कि ये सामान्य धातुओं से कहीं अधिक वजनदार होती हैं.
यह भारी धातुएं आसानी से खत्म नहीं होती और दशकों तक मिट्टी में बनी रह सकती हैं. जहां फसलें इन्हें अवशोषित कर लेती हैं और यह जहर खाद्य श्रृंखला का हिस्सा बन जाता है.
समय के साथ ये शरीर में जमा होती जाती हैं और ऐसे स्थाई रोग उत्पन्न कर सकती हैं, जिनके लक्षण सामने आने में कई साल लग सकते हैं.
आठ लाख मिट्टी के नमूनों का परीक्षण
गौरतलब है कि यह पहली बार है जब वैज्ञानिकों ने दुनिया भर में मिट्टी में मौजूद भारी धातुओं के प्रदूषण का इतने बड़े स्तर पर विश्लेषण किया है.
अपने अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने दुनिया भर से जुटाए गए करीब आठ लाख मिट्टी के नमूनों का परीक्षण किया है.
इसके साथ ही उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की मदद से उन इलाकों की पहचान की है, जहां जमीन में जहर सबसे ज्यादा फैल चुका है.
अध्ययन में वैज्ञानिकों ने सात जहरीली धातुओं आर्सेनिक, कैडमियम, कोबाल्ट, क्रोमियम, कॉपर, निकल और सीसा पर ध्यान केंद्रित किया है.
शोधों से पता चला है कि इन भारी धातुओं की मात्रा अगर तय सीमा से अधिक हो तो वो इंसानों, जानवरों और पौधों के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं.
यह पेट की समस्या, किडनी सम्बन्धी बीमारियों और कैंसर का कारण बन सकती है.
भारत में इसका खतरा ज्यादा
जर्नल एनवायरनमेंट इंटरनेशनल में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन से पता चला है कि गर्भावस्था के समय भारी धातुओं के संपर्क में आने से बच्चे में जन्म के समय होने वाली समस्याएं जैसे समय से पहले जन्म और जन्म के समय बच्चे का कम वजन हो सकता है.
अगर लोग लंबे समय तक आर्सेनिक, कैडमियम या सीसे के संपर्क में रहते हैं, तो उन्हें कैंसर, किडनी की बीमारी, हड्डियों के कमजोर होने (ऑस्टियोपोरोसिस) और बच्चों में विकास संबंधी समस्याएं हो सकती हैं.
भारत जैसे देशों में जहां लोगों का भोजन ज्यादातर एक ही अनाज, जैसे चावल या गेहूं पर निर्भर होता है, वहां यह खतरा और भी अधिक बढ़ जाता है.
140 करोड़ लोगों का जीवन दांव पर
रिसर्च से पता चला है कि मिट्टी में मौजूद भारी धातुएं फसलों और पानी के जरिए खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर सकती हैं.
इसकी वजह से लंबे समय तक स्वास्थ्य और पर्यावरण पर असर पड़ता है.
प्रदूषित जमीन में इन भारी धातुओं की मात्रा तय सीमा से कहीं अधिक है. अध्ययन में यह भी सामने आया है कि करीब 90 से 140 करोड़ लोग गंभीर खतरे वाले क्षेत्रों में रह रहे हैं.
इंसानी गतिविधियां इसके लिए जिम्मेदार
वैज्ञानिकों ने इस बात की भी पुष्टि की है कि मिट्टी में घुलता यह जहर सिर्फ प्राकृतिक नहीं है. इंसानी गतिविधियां जैसे उद्योग, खनन और खेतों में केमिकल्स का बढ़ता उपयोग भी इसका बड़ा कारण है.
संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने चेताया है कि यदि मौजूदा हालात जारी रहे, तो 2050 तक दुनिया की 90 फीसदी मिट्टी खतरे में पड़ सकती है.
इसके लिए मिट्टी का कटाव, केमिकल युक्त खाद, कीटनाशकों का जरूरत से ज्यादा उपयोग और औद्योगिक प्रदूषण जैसे कारक जिम्मेदार हैं.
मिट्टी पर बढ़ते दबाव के लिए लिए अनियंत्रित तरीके से बढ़ रही औद्योगिक गतिविधियां, कृषि, खनन और शहरी प्रदूषण मुख्य कारण है.
अध्ययन में वैज्ञानिकों ने आंकड़ों की कमी को भी उजागर किया है.
यह अध्ययन एक वैज्ञानिक चेतावनी की तरह सामने आया है, जो नीति-निर्माताओं, किसानों और समाज से यह अपील करता है कि वे मिट्टी, भोजन और स्वास्थ्य की रक्षा के लिए जल्द से जल्द और ठोस कदम उठाएं.
चिंताजनक बात यह है कि पृथ्वी पर हर साल एक करोड़ हेक्टेयर जंगलों वाले इलाके नष्ट हो रहे हैं, यह क्षेत्र आइसलैंड से भी बड़ा है.
एक स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र हमें बीमारियों से बचाने में मदद करता है. जैविक विविधता रोगजनकों के तेजी से फैलने से रोकती है.
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, लगभग दस लाख पशु और पौधों की प्रजातियां अब विलुप्ति होने की कगार पर हैं.