ट्रूडो का 'टकराव' वाली नीति छोड़ अब 'दोस्ती' की राह पर PM मार्क कार्नी
नई दिल्ली/ओटावा । डेस्क: कनाडा के नवनियुक्त प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की पहली भारत यात्रा के साथ ही दोनों देशों के रिश्तों में एक नाटकीय और रणनीतिक बदलाव देखने को मिल रहा है. पूर्व प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के कार्यकाल में जो रिश्ते 'सिख अलगाववाद' और 'हत्या के आरोपों' की भेंट चढ़कर अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए थे, उन्हें कार्नी अब आर्थिक और कूटनीतिक सूझबूझ से फिर से पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं.
हालांकि, पर्दे के पीछे सुरक्षा चुनौतियां अब भी बरकरार हैं. एक तरफ ओटावा के अधिकारी भारत को 'अब सुरक्षा के लिए खतरा नहीं' बता रहे हैं, तो दूसरी तरफ कनाडा के सरे (Surrey) में पुलिस अब भी सिख कार्यकर्ताओं को संभावित जानलेवा खतरों की चेतावनी दे रही है. यह विरोधाभास कार्नी सरकार की उस नई नीति का हिस्सा है, जिसे विशेषज्ञ 'शांत कूटनीति' कह रहे हैं.
रिश्तों में आई इस जमी हुई बर्फ के पिघलने की सबसे बड़ी वजह अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का 'ट्रेड वॉर' माना जा रहा है. विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप प्रशासन की संरक्षणवादी नीतियों और व्यापारिक अनिश्चितता के बीच कनाडा अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए नए और मजबूत साझेदारों की तलाश में है. इस कड़ी में भारत एक अनिवार्य विकल्प बनकर उभरा है.
मार्क कार्नी, जो खुद एक प्रखर अर्थशास्त्री रहे हैं, यह भली-भांति समझते हैं कि भारत के साथ व्यापारिक संबंधों को लंबे समय तक अधर में नहीं लटकाया जा सकता. यही कारण है कि पिछले साल मार्च में सत्ता संभालने के बाद से ही उन्होंने ट्रूडो की 'मेगाफोन डिप्लोमेसी' (सार्वजनिक बयानबाजी) को छोड़कर संस्थागत संवाद पर जोर दिया है.
मार्क कार्नी की इस दो दिवसीय भारत यात्रा के दौरान ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज (Critical Minerals), कृषि, शिक्षा और अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण समझौतों की उम्मीद है. हैदराबाद हाउस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी मुलाकात को द्विपक्षीय रणनीतिक साझेदारी के पुनरुद्धार के रूप में देखा जा रहा है.
याद रहे कि ट्रूडो के समय में हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के बाद संबंधों में जो दरार आई थी, उसने दोनों देशों के बीच राजनयिकों के निष्कासन और वीजा सेवाओं के निलंबन तक की नौबत ला दी थी.
लेकिन कार्नी के नेतृत्व में ओटावा अब सुरक्षा चिंताओं और आर्थिक हितों को अलग-अलग खांचों में रखने की कोशिश कर रहा है. कनाडा अब चाहता है कि अंतरराष्ट्रीय दमन और हस्तक्षेप जैसे सुरक्षा मुद्दों को कानून प्रवर्तन एजेंसियों और राष्ट्रीय सुरक्षा सहयोग के माध्यम से सुलझाया जाए, न कि सार्वजनिक मंचों से आरोप लगाकर.
हालांकि, यह रास्ता इतना भी आसान नहीं है. सरे के सिख कार्यकर्ता मोनिंदर सिंह का हालिया मामला यह दर्शाता है कि जमीन पर तनाव अभी खत्म नहीं हुआ है. मोनिंदर सिंह को पुलिस ने हाल ही में उनके और उनके परिवार पर मंडराते खतरे की जानकारी दी है, जिसे सीधे तौर पर निज्जर मामले की कड़ी से जोड़कर देखा जा रहा है.
इसके बावजूद, कनाडाई सरकार का भारत को 'खतरा' मानने से इनकार करना एक बड़े कूटनीतिक 'रीसेट' का संकेत है.
एशिया पैसिफिक फाउंडेशन ऑफ कनाडा की वीना नाजीबुल्ला के अनुसार, कार्नी सरकार अब कानून के शासन की रक्षा और अंतरराष्ट्रीय हितों को साथ लेकर चलने की संतुलनकारी नीति अपना रही है. लेकिन वह यह भी चेतावनी देती हैं कि यदि सुरक्षा संबंधी गंभीर आरोपों का कोई विश्वसनीय समाधान नहीं निकला, तो यह सामान्यीकरण 'राजनीतिक रूप से नाजुक' बना रहेगा और किसी भी नई घटना या अदालती खुलासे से दोबारा बिखर सकता है.
भारत के लिए भी यह बदलाव राहत की बात है. नई दिल्ली लंबे समय से कनाडा से अपनी धरती पर सक्रिय 'खालिस्तानी चरमपंथ' के खिलाफ कार्रवाई की मांग करती रही है.
प्रधानमंत्री मोदी ने कार्नी के पद संभालते ही उन्हें बधाई दी थी, जो इस बात का संकेत था कि भारत भी संबंधों में सुधार के लिए तैयार है.
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद भारत और कनाडा दोनों ही अमेरिका पर अपनी अत्यधिक निर्भरता कम करना चाहते हैं.
जहां भारत ने अमेरिका के साथ अपने व्यापारिक वार्ता को काफी हद तक स्थिर कर लिया है, वहीं कनाडा अभी भी वाशिंगटन के साथ कई विश्वदृष्टिकोणों पर असहमत है. ऐसे में नई दिल्ली और ओटावा के लिए एक-दूसरे के करीब आना एक 'नो-ब्रेनार' यानी स्वाभाविक फैसला बन गया है.
अब देखना यह होगा कि मार्क कार्नी की यह 'व्यावहारिक कूटनीति' पुराने घावों को भरने और भविष्य की चुनौतियों से निपटने में कितनी कारगर साबित होती है.