पाकिस्तान और ईरान का दावा- युद्ध विराम में लेबनान भी शामिल है
नई दिल्ली । डेस्क: पाकिस्तान और ईरान ने स्पष्ट रूप से यह दावा किया है कि हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच हुआ दो सप्ताह का संघर्ष विराम केवल द्विपक्षीय सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें लेबनान भी पूरी तरह शामिल है. इस महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटनाक्रम में पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई है और उसके द्वारा जारी आधिकारिक बयान इस दावे का सबसे बड़ा आधार है.
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के कार्यालय से जारी घोषणा में लेबनान का नाम स्पष्ट रूप से अंकित किया गया था, जिसे आधार बनाकर ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने वाशिंगटन को चेतावनी दी है कि समझौते की शर्तें स्पष्ट हैं.
अराघची के अनुसार, अमेरिका को यह चुनना होगा कि वह वास्तव में शांति चाहता है या इजरायल के माध्यम से युद्ध को जारी रखना चाहता है. यह विवाद तब और गहरा गया जब इजरायल ने लेबनान पर अब तक के सबसे भीषण और विनाशकारी हमले किए, जिससे न केवल सैकड़ों निर्दोष नागरिकों की जान गई, बल्कि उस शांति-वार्ता पर भी प्रश्नचिह्न लग गया जिसे बड़ी मशक्कत के बाद शुरू किया गया था.
जानकारों का मानना है कि यदि इजरायल ने लेबनान पर यह बर्बर हमला न किया होता, तो शांति-वार्ता और संघर्ष विराम की प्रक्रिया इस कदर खतरे में न पड़ती.
तथ्यों के आधार पर देखा जाए तो पाकिस्तान द्वारा साझा किए गए संघर्ष विराम के मसौदे में क्षेत्रीय स्थिरता और उन सभी मोर्चों पर शत्रुता समाप्त करने की बात कही गई है जहाँ ईरान समर्थित समूह और इजरायल के बीच टकराव जारी है.
ईरानी पक्ष का तर्क है कि लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ इजरायली कार्रवाई सीधे तौर पर ईरान के हितों और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़ी है, इसलिए इसे समझौते से अलग नहीं रखा जा सकता.
हालांकि, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन इस दावे को एक 'गलतफहमी' बता रहा है, लेकिन पाकिस्तानी दस्तावेज में लेबनान का उल्लेख ईरान के दावों को मजबूती प्रदान करता है.
इजरायल द्वारा बुधवार को किए गए हमलों में 254 लोगों की मौत और 1,100 से अधिक लोगों के घायल होने की घटना ने इस संघर्ष विराम की नाजुकता को उजागर कर दिया है.
ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि यदि लेबनान में आक्रामकता तुरंत नहीं रुकी, तो वे इसे समझौते का उल्लंघन मानेंगे और 'पछतावे वाला जवाब' देंगे.
मौजूदा संकट यह दर्शाता है कि इजरायल की निरंतर सैन्य कार्रवाई न केवल लेबनान को तबाह कर रही है, बल्कि अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक समाधान की किसी भी संभावना को भी समाप्त करने की ओर बढ़ रही है. यदि इजरायल ने संयम दिखाया होता, तो मध्य पूर्व में चल रही यह शांति प्रक्रिया एक स्थायी समाधान की दिशा में आगे बढ़ सकती थी.
उधर, ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाग़र ग़ालिबाफ़ ने एक बयान जारी किया है. इसमें कहा है, "बातचीत शुरू होने से पहले ही 10 बिंदुओं वाले प्रस्ताव की तीन शर्तों का उल्लंघन हो गया है. हमारा अमेरिका पर भरोसा न होने की वजह उसकी पुरानी आदत है, वो बार-बार अपने वादे तोड़ता आया है. अफ़सोस की बात है कि उसने फिर वही पैटर्न दोहराया है."
उन्होंने दावा किया है कि लेबनान में युद्धविराम से जुड़ी पहली शर्त का पालन नहीं किया गया. जबकि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने भी साफ़ कहा था कि 'तुरंत हर जगह युद्धविराम होना चाहिए, लेबनान और अन्य इलाकों में भी.'