नेपाल बाढ़ आपदा: भारत बोला- 'जलवायु संकट के लिए विकसित देश जिम्मेदार'
नई दिल्ली । डेस्क: नेपाल में हाल ही में आई भीषण बाढ़ और प्राकृतिक आपदा के बाद जलवायु परिवर्तन पर मुआवजे की बहस तेज हो गई है. इस मुद्दे पर भारत के विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि जलवायु परिवर्तन एक साझा चुनौती जरूर है, लेकिन इसके समाधान की प्राथमिक जिम्मेदारी उन विकसित राष्ट्रों की है जो ऐतिहासिक रूप से वैश्विक स्तर पर सबसे बड़े उत्सर्जनकर्ता रहे हैं.
यह प्रतिक्रिया नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल द्वारा दिए गए उस बयान के बाद आई है, जिसमें उन्होंने अमेरिका, चीन और भारत को सबसे बड़े ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक बताते हुए जलवायु क्षतिपूर्ति का जिक्र किया था.
हालांकि बाद में खनाल ने स्पष्ट किया कि वे किसी देश से सीधे मुआवजे की मांग नहीं कर रहे हैं और उन्होंने संकट के समय भारत द्वारा दी गई त्वरित सहायता के लिए गहरा आभार व्यक्त किया.
भारत ने नेपाल के रुख पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जलवायु कार्रवाई 'सामान्य लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों' (CBDR) के सिद्धांत पर आधारित होनी चाहिए.
भारत का मानना है कि जिन विकसित देशों ने औद्योगिक विकास के दौर में सबसे अधिक उत्सर्जन किया, उन्हें ही वित्तीय सहायता और हरित तकनीक हस्तांतरण के जरिए विकासशील और संवेदनशील देशों का नेतृत्व करना चाहिए.
26 अगस्त को नेपाल में आई आपदा के बाद से भारत ने एक सच्चे पड़ोसी और मित्र की भूमिका निभाते हुए बड़े पैमाने पर राहत सामग्री और सुरंग बचाव विशेषज्ञों की टीम भेजी है. विदेश मंत्रालय ने पुष्टि की है कि भारत आवश्यकता पड़ने पर आगे भी हर संभव सहायता जारी रखेगा.
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने भी भारतीय सहायता के लिए अपनी संसद में सार्वजनिक रूप से भारत का धन्यवाद व्यक्त किया है. आगामी संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र से पहले यह मुद्दा दक्षिण एशियाई क्षेत्र में वैश्विक जलवायु न्याय की नई बहस को जन्म दे रहा है.
कुल नुकसान
नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण (NDRRMA) के प्राथमिक अनुमान के अनुसार, इस बाढ़ आपदा में देश की संपत्तियों, मकानों, सड़कों और बुनियादी ढांचों को कम से कम 2.56 अरब डॉलर (लगभग 387.5 अरब नेपाली रुपये) का भारी नुकसान हुआ है. इसके अलावा, शुरुआती 4 महीनों में आवश्यक सेवाओं और अस्थायी पुनर्वास के लिए ही कम से कम 5.26 करोड़ डॉलर (7.95 अरब नेपाली रुपये) की तत्काल लागत का अनुमान लगाया गया है.
नेपाल क्यों मांग रहा है मुआवजा?
नेपाल इस संकट को "जलवायु न्याय (Climate Justice)" और "जलवायु क्षतिपूर्ति (Loss and Damage Compensation)" के दृष्टिकोण से देख रहा है. इसके पीछे नेपाल के प्रमुख तर्क निम्न हैं:
1) अत्यधिक संवेदनशीलता लेकिन नगण्य उत्सर्जन: नेपाल जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित और संवेदनशील देशों में से एक है, जबकि वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में इसका योगदान नगण्य (0.1% से भी कम) है.
2) ऐतिहासिक उत्तरदायित्व (Historical Responsibility): नेपाल का मानना है कि इस तरह की अत्यधिक और बेमौसम आपदाएँ (जैसे ग्लेशियर पिघलना और अचानक आई भीषण बाढ़) ग्लोबल वार्मिंग का परिणाम हैं. इसके लिए दुनिया की प्रमुख औद्योगिक अर्थव्यवस्थाएँ और बड़े उत्सर्जक देश ऐतिहासिक रूप से जिम्मेदार हैं.
3) सहायता नहीं, न्याय की मांग: नेपाल इसे सिर्फ मानवीय सहायता (Aid) के रूप में नहीं, बल्कि उन देशों का नैतिक और अंतर्राष्ट्रीय दायित्व (Compensation) मानता है जिनके भारी प्रदूषण का खामियाजा गरीब व पहाड़ी देशों को भुगतना पड़ रहा है.