महानदी जल विवाद: कल क्या हुआ, विवाद क्या है?
नई दिल्ली । डेस्क: महानदी नदी के जल बंटवारे को लेकर ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच लंबे समय से चल रहा विवाद अब सुलह की राह पर बढ़ता दिख रहा है. दोनों राज्यों ने इस मसले को आपसी सहमति से हल करने की इच्छा जताई है. शनिवार (2 अगस्त 2025) को सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी की अध्यक्षता में महानदी जल विवाद ट्रिब्यूनल ने इस मामले की अगली सुनवाई 6 सितंबर को निर्धारित की है.
आपसी सहमति की कोशिश
ट्रिब्यूनल ने दोनों राज्यों को निर्देश दिया है कि वे इस विवाद को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझाने की दिशा में कदम उठाये और अगली सुनवाई में प्रगति की जानकारी दें. ट्रिब्यूनल ने कहा, "हम उचित समझते हैं कि दोनों राज्यों को इस विवाद को आपसी बातचीत से हल करने के लिये और समय दिया जाये. अगली तारीख पर इसकी प्रगति की जानकारी ट्रिब्यूनल को दी जाये" इसके लिए दोनों राज्यों के संबंधित सचिवों को अगली सुनवाई में उपस्थित रहने और बातचीत की प्रगति की जानकारी देने को कहा गया है.
ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच पत्राचार
ओडिशा के महाधिवक्ता पीतांबर आचार्य ने ट्रिब्यूनल के समक्ष एक उच्च-स्तरीय बैठक के विवरण और ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन माझी द्वारा छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को लिखे गए पत्र को प्रस्तुत किया. इस पत्र में माझी ने प्रस्ताव दिया कि केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय के मार्गदर्शन में केंद्रीय जल आयोग की अगुआई में दोनों राज्यों की एक संयुक्त समिति गठित की जाये. इस समिति में दोनों राज्यों के वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी शामिल होंगे, जो निरंतर संवाद और तकनीकी वार्ता के माध्यम से आपसी हित में समझौता करने का प्रयास करेंगे.
माझी ने अपने पत्र में लिखा, "मुझे दृढ़ विश्वास है कि दोनों राज्यों और केंद्रीय जल आयोग के सक्रिय सहयोग से हम इस जटिल मुद्दे का न्यायपूर्ण, समान और समयबद्ध समाधान निकाल सकते हैं. इससे न केवल शांति और स्थिरता आयेगी, बल्कि ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच सहयोग, विश्वास और सद्भावना भी बढ़ेगी." जवाब में, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने 1 अगस्त को लिखे पत्र में कहा कि महानदी जल विवाद के सौहार्दपूर्ण समाधान का प्रस्ताव विचाराधीन है.
महानदी का महत्व और विवाद का कारण
महानदी, जिसे ओडिशा की जीवनरेखा कहा जाता है, छत्तीसगढ़ के अमरकंटक पहाड़ियों से निकलती है. यह नदी 851 किलोमीटर की यात्रा करती है, जिसमें से 494 किलोमीटर ओडिशा में है, और अंत में बंगाल की खाड़ी में समाहित होती है. इस नदी की कई सहायक नदियां, शाखायें और उप-शाखायें हैं, जो मानव बस्तियों, पारिस्थितिकी तंत्र और विभिन्न जल-निर्भर जरूरतों को पूरा करती हैं.
छत्तीसगढ़ के अलग राज्य बनने के बाद, उसने ओडिशा से परामर्श किये बिना कई बड़े, मध्यम और छोटे सिंचाई परियोजनाएं, एनिकट और औद्योगिक बैराज बनाये. दोनों राज्यों के बीच कोई औपचारिक जल बंटवारा समझौता नहीं है. ओडिशा का कहना है कि छत्तीसगढ़ की इन परियोजनाओं और बढ़ते जल उपयोग के कारण महानदी का प्रवाह उसके क्षेत्र में काफी कम हो गया है, जिससे सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और तटीय क्षेत्रों के पारिस्थितिक संतुलन पर बुरा असर पड़ा है.
छत्तीसगढ़ का दावा
छत्तीसगढ़ का दावा है कि महानदी के कुल जलग्रहण क्षेत्र का 52.9% और हीराकुड बांध तक के जलग्रहण क्षेत्र का 89.9% उसके क्षेत्र में है, इसलिये उसे इस जल का उपयोग करने का अधिकार है. दूसरी ओर, ओडिशा ने छत्तीसगढ़ द्वारा बनाये गए 500 से अधिक एनिकट और 30 बैराज, जिनमें से कई औद्योगिक उपयोग के लिये हैं, पर आपत्ति जताई है.
कानूनी लड़ाई और ट्रिब्यूनल का गठन
ओडिशा ने केंद्र सरकार के समक्ष छत्तीसगढ़ द्वारा महानदी के जल के अंधाधुंध उपयोग के खिलाफ विरोध दर्ज किया था, लेकिन इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया गया. इसके बाद, ओडिशा ने सुप्रीम कोर्ट में इस विवाद को लेकर मुकदमा दायर किया. 23 जनवरी 2018 को हुई अंतिम सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को एक ट्रिब्यूनल गठित करने का निर्देश दिया. इसके परिणामस्वरूप, जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय ने 12 मार्च 2018 को अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत महानदी जल विवाद ट्रिब्यूनल का गठन किया.
दोनों राज्यों के बीच सौहार्दपूर्ण समाधान की दिशा में यह कदम एक सकारात्मक संकेत है. यदि यह प्रयास सफल होता है, तो न केवल यह विवाद हल होगा, बल्कि दोनों राज्यों के बीच सहयोग और विश्वास भी बढ़ेगा. अगली सुनवाई में इस दिशा में हुई प्रगति पर सभी की नजर रहेगी.