नए 'G-RAM-G' बिल के खिलाफ सड़क पर उतरेंगे वामपंथी दल
नई दिल्ली । डेस्क: वामपंथी दल मनरेगा के बदले नया कानून लाने के विरोध में देशभर में प्रदर्शन करेंगे. केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित नए श्रम सुधारों और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) को बदलकर 'विकसित भारत–गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) विधेयक, 2025' (VB G-RAM-G Bill) लाने के प्रस्ताव ने देश में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ा दी है. इसके विरोध में पांच प्रमुख वामपंथी दलों ने आगामी 22 दिसंबर को देशव्यापी विरोध प्रदर्शन का बिगुल फूंक दिया है.
बुधवार को जारी एक संयुक्त बयान में सीपीआई(एम), सीपीआई, सीपीआई(एमएल) लिबरेशन, आरएसपी और ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक ने केंद्र सरकार के इस कदम की कड़ी आलोचना की. वामपंथी नेताओं ने इस विधेयक को भारत के 'ग्रामीण सुरक्षा कवच' को नष्ट करने का एक सुनियोजित प्रयास करार दिया है.
वामपंथी नेतृत्व का तर्क है कि 'G-RAM-G' विधेयक के लागू होने से ग्रामीण रोजगार का 'मांग-आधारित' (Demand-driven) स्वरूप समाप्त हो जाएगा, जो 2005 से ग्रामीणों का कानूनी अधिकार रहा है. विरोध के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
राज्यों पर आर्थिक बोझ: नए प्रस्ताव के तहत बेरोजगारी भत्ते का भुगतान, देरी से भुगतान का मुआवजा और कार्यक्रम के खर्च का बड़ा हिस्सा अब राज्य सरकारों को उठाना होगा. वाम दलों का कहना है कि इससे राज्यों की आर्थिक स्थिति खराब होगी.
60 दिनों का निलंबन: विधेयक में खेती के पीक सीजन के दौरान काम को 60 दिनों तक निलंबित करने का प्रावधान है. आलोचकों के अनुसार, इससे मजदूर फिर से स्थानीय जमींदारों पर निर्भर होने को मजबूर हो जाएंगे.
डिजिटल हाजिरी का विरोध: बयान में अनिवार्य डिजिटल ट्रैकिंग को हटाने की मांग की गई है, क्योंकि तकनीकी खामियों के कारण कई मजदूरों को उनकी मजदूरी नहीं मिल पा रही है.
नाम बदलना 'गांधी का अपमान': वामपंथी दलों ने कहा कि अधिनियम से महात्मा गांधी का नाम हटाना केवल रीब्रांडिंग नहीं, बल्कि उनके विचारों के प्रति भाजपा और आरएसएस की शत्रुता को दर्शाता है.
सरकार ने दावा किया है कि नए बिल के तहत गारंटीशुदा कार्य दिवसों की संख्या 100 से बढ़ाकर 125 कर दी जाएगी. हालांकि, वामपंथी दलों ने इसे एक 'जुमला' बताते हुए खारिज कर दिया है. उनका कहना है कि जब बुनियादी ढांचे को ही कमजोर किया जा रहा है, तो कार्य दिवस बढ़ाने का वादा बेमानी है.
गौरतलब है कि 2005 में जब मनरेगा कानून पास हुआ था, तब यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे वामपंथी दलों ने इसे लागू करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. अब वे इसे बचाने के लिए 22 दिसंबर को देशभर में जिला मुख्यालयों और ब्लॉकों पर प्रदर्शन करेंगे.