कर्नाटक के स्कूल में 17 वर्षीय छात्रा ने शौचालय में दिया बच्चे को जन्म
बेंगलुरू । डेस्क: कर्नाटक के यदगिर जिले के शाहपुर में एक सरकारी आवासीय स्कूल में उस समय हंगामा मच गया जब नवीं कक्षा की एक 17 वर्षीय छात्रा ने स्कूल के शौचालय में अचानक एक पुत्र को जन्म दिया. इस घटना ने स्कूल प्रशासन से लेकर स्थानीय समुदाय तक सभी को स्तब्ध कर दिया.
पुलिस सूत्रों के अनुसार, लगभग नौ महीने पहले इस छात्रा के साथ एक युवक ने यौन उत्पीड़न किया था, जिसके परिणामस्वरूप वह गर्भवती हो गई थी. आश्चर्यजनक रूप से, इस लंबे समय तक न तो स्कूल और न ही हॉस्टल के शिक्षकों या कर्मचारियों को उसके शारीरिक परिवर्तनों का कोई अंदाजा हुआ. बुधवार दोपहर को सहपाठियों ने उसे शौचालय में दर्द से कराहते हुए देखा, तब जाकर यह मामला सामने आया.
शिक्षकों ने तुरंत कार्रवाई की और छात्रा को नवजात शिशु के साथ अस्पताल में भर्ती कराया. डॉक्टरों के अनुसार, मां और बच्चा दोनों फिलहाल स्थिर स्थिति में हैं. नवजात को नियोनेटल केयर यूनिट में निगरानी में रखा गया है, जबकि मां का रक्ताल्पता और संक्रमण के जोखिम से निपटने के लिए इलाज चल रहा है.
पुलिस कार्रवाई और कानूनी कदम
शाहपुर पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया है. 28 वर्षीय एक युवक को मुख्य आरोपी के रूप में गिरफ्तार कर पूछताछ शुरू की गई है. पुलिस ने बताया कि फॉरेंसिक मेडिकल परीक्षण, घटना का पुनर्निर्माण, और बयान दर्ज करने के बाद जल्द ही चार्जशीट दाखिल की जाएगी. प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि पीड़िता और नवजात की पहचान गोपनीय रखते हुए कानून के तहत अधिकतम सजा सुनिश्चित की जाएगी.
इस घटना ने स्कूल प्रशासन की लापरवाही पर गंभीर सवाल उठाए हैं. कर्नाटक रेजिडेंशियल एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन सोसाइटी (KREIS) ने तत्काल जांच शुरू की है. प्रारंभिक जांच में लापरवाही के आरोप में स्कूल के प्रिंसिपल, हॉस्टल वार्डन, स्टाफ नर्स सहित चार कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया है. यह भी आरोप है कि पीड़िता के भाई ने इस मामले को छिपाया, जिसके खिलाफ भी कार्रवाई की गई है.
सामाजिक और प्रशासनिक प्रतिक्रिया
कर्नाटक राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (KSCPCR) ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए जिला प्रशासन से विस्तृत जांच रिपोर्ट मांगी है. जिला बाल संरक्षण इकाई ने भी अलग से शिकायत दर्ज की है और पीड़िता के लिए कानूनी सहायता, मनो-सामाजिक परामर्श, और सुरक्षित आश्रय की व्यवस्था कर रही है.
स्थानीय लोगों ने इस घटना पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया है. उनका कहना है कि एक छात्रा के इतने लंबे समय तक गर्भवती रहने के बावजूद स्कूल का इस पर ध्यान न जाना अस्वीकार्य लापरवाही है. बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि केवल कुछ कर्मचारियों को निलंबित करना पर्याप्त नहीं है. आवासीय स्कूलों में नियमित स्वास्थ्य जांच, मनोवैज्ञानिक परामर्श, और सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना अब सबसे जरूरी है.
विशेषज्ञों की सलाह
विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि स्कूलों में सीसीटीवी निगरानी बढ़ाने, गोपनीय शिकायत चैनल शुरू करने, और किशोर-किशोरियों के लिए अनिवार्य मासिक स्वास्थ्य जांच के साथ विश्वास-आधारित रिपोर्टिंग सिस्टम लागू करने की आवश्यकता है. इसके अलावा, शिक्षकों और कर्मचारियों के लिए POCSO संवेदनशीलता प्रशिक्षण, हॉस्टल में बाहरी सामाजिक कार्यकर्ताओं की नियमित यात्राएं, और 24x7 हेल्पलाइन की व्यवस्था भी अनिवार्य है.
भविष्य के लिए सबक
बाल अधिकार संगठनों ने चेतावनी दी है कि ग्रामीण कर्नाटक में किशोरियों पर यौन हिंसा और नाबालिग मातृत्व का जोखिम अभी भी चिंताजनक है. स्कूल-आधारित जागरूकता कार्यक्रमों को न केवल गर्भावस्था जांच तक सीमित रखना चाहिए, बल्कि सहमति शिक्षा, सुरक्षित वातावरण, और उत्पीड़न के प्रारंभिक संकेतों की पहचान को प्राथमिकता देनी चाहिए. साथ ही, जानकारी छिपाने वाले परिवार या सहपाठियों के प्रति दंडात्मक के बजाय सहानुभूतिपूर्ण और परामर्श-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है ताकि भविष्य में पीड़ित बिना डर के सामने आ सकें.
यह घटना एक बार फिर देश के आवासीय स्कूलों में किशोरियों की सुरक्षा की कमजोरियों को उजागर करती है. प्रशासन पर दबाव है कि न केवल अपराधी को सजा दी जाए, बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए संरचनात्मक सुधार भी किए जाएं. (फोटो-प्रतीकात्मक)