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गाजा शांति समझौते पर इजराइल में घमासान, संकट में नेतन्याहू

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01 अग. 2026, 06:32 PM 4 मिनट में पढ़ें 3

नेतन्याहू
नेतन्याहू

नई दिल्ली । डेस्क: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा गाजा में हमास के हथियार डालने पर सहमति जताने के ऐलान के बाद जहां वाशिंगटन में इसे एक बड़ी कूटनीतिक जीत के रूप में देखा जा रहा है, वहीं इजराइल की घरेलू राजनीति में भूचाल आ गया है. इस समझौते की शर्तों के तहत इजराइल को गाजा पट्टी से अपनी सेना वापस बुलानी होगी और सत्ता धीरे-धीरे फिलिस्तीनी प्रशासन को सौंपनी होगी. हालांकि, इन शर्तों को इजराइली नेताओं और मीडिया की ओर से बेहद कड़ा विरोध झेलना पड़ रहा है, जिससे आगामी चुनावों से ठीक पहले देश का सियासी माहौल गरमा गया है.


इजराइली कटरपंथियों का कड़ा रुख और समझौते का विरोध


भले ही राष्ट्रपति ट्रम्प का दावा है कि इजराइल इस समझौते से बेहद खुश है, लेकिन इजराइली सरकार के भीतर से आ रही आवाजें कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं. एक वरिष्ठ इजराइली अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर स्पष्ट किया कि हमास के पूर्ण और वास्तविक निरस्त्रीकरण से पहले गाजा में मौजूद इजराइली सैन्य ठिकानों से पीछे हटने का कोई सवाल ही नहीं उठता.

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इजराइल का दक्षिणपंथी खेमा इस समझौते को सीधे तौर पर खारिज कर रहा है. देश के कट्टरपंथी राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इमरात बेन-ग्विर ने सोशल मीडिया पर अपनी भड़ास निकालते हुए इसे पूरी तरह से अमानवीय और अस्वीकार्य करार दिया है. उनका तर्क है कि हमास के आतंकवादियों के खिलाफ लक्षित अभियानों को रोकना अगली त्रासदी को न्योता देने जैसा होगा. बेन-ग्विर का मानना है कि जीत का एकमात्र रास्ता गाजा में सैन्य कार्रवाई जारी रखना और वहां से फिलिस्तीनियों के प्रवासन को बढ़ावा देना ही है.


मध्यममार्गी नेताओं की आशंकाएं और जनभावना


केवल कट्टरपंथी ही नहीं, बल्कि इजराइली राजनीति के मध्यममार्गी चेहरे भी इस समझौते पर कड़ा ऐतराज जता रहे हैं. पूर्व सेना प्रमुख और प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू के मुख्य प्रतिद्वंद्वी गादी आइजनकोट ने इस समझौते की मंशा पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं. उनका कहना है कि हमास की सैन्य शक्ति के पूर्ण विनाश के बिना किया गया कोई भी समझौता इजराइल की राष्ट्रीय सुरक्षा और युद्ध के उद्देश्यों की विफलता माना जाएगा.


इस राजनीतिक विरोध के पीछे इजराइल की मौजूदा जनभावना भी एक बड़ी वजह है. देश के भीतर बड़े पैमाने पर यह भावना घर कर चुकी है कि गाजा से सेना वापस बुलाना और वहां पुनर्निर्माण की राह खोलना राष्ट्रीय हितों के खिलाफ है. कई सर्वेक्षणों से भी यह संकेत मिलता है कि इजराइली जनता का एक बड़ा वर्ग गाजा को लेकर सख्त रुख बनाए रखने का समर्थक है.


नेतन्याहू के लिए राजनीतिक जीवन-मरण का प्रश्न


इस पूरे घटनाक्रम के बीच इजराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू की चुप्पी सबसे ज्यादा ध्यान खींच रही है. आगामी अक्टूबर में होने वाले आम चुनाव नेतन्याहू के राजनीतिक और व्यक्तिगत भविष्य के लिए बेहद निर्णायक हैं. भ्रष्टाचार के कई मामलों का सामना कर रहे नेतन्याहू के लिए सत्ता में बने रहना कानूनी लड़ाइयों से बचने का सबसे बड़ा जरिया है. ऐसे में वे अपनी दक्षिणपंथी गठबंधन सरकार के सहयोगियों को किसी भी कीमत पर नाराज नहीं कर सकते, जो युद्ध रोकने या सेना हटाने के किसी भी कदम पर सरकार गिराने की धमकी दे रहे हैं.


राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि नेतन्याहू इस समय दोधारी तलवार पर चल रहे हैं. एक तरफ उन्हें अपने दक्षिणपंथी वोट बैंक और गठबंधन सहयोगियों को साधे रखना है, तो दूसरी तरफ अपने सबसे बड़े सहयोगी अमेरिका और राष्ट्रपति ट्रम्प को भी नाराज न करने की चुनौती है.


डोनाल्ड ट्रम्प को खुश रखने की मजबूरी और भावी रणनीति


अमेरिका में ट्रम्प प्रशासन का रुख सख्त है और वाशिंगटन से ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि यदि इजराइल इस निरस्त्रीकरण समझौते से पीछे हटता है, तो राष्ट्रपति ट्रम्प बेहद नाराज हो सकते हैं. नेतन्याहू को चुनाव से पहले अमेरिकी समर्थन और संभावित कूटनीतिक तोहफों की सख्त जरूरत है.


विश्लेषकों का अनुमान है कि नेतन्याहू अमेरिका को दिखाने के लिए गाजा के भीतर कुछ प्रतीकात्मक सैन्य फेरबदल या हस्ताक्षर समारोह जैसी सांकेतिक कार्रवाई कर सकते हैं. हालांकि, जमीनी स्तर पर पूरी तरह से गाजा छोड़ना उनकी मूल विचारधारा और राजनीतिक रणनीति के खिलाफ जाता दिख रहा है. चुनाव नजदीक आते देख यह संभावना ज्यादा जताई जा रही है कि अपनी राजनीतिक साख बचाने के लिए नेतन्याहू गाजा में पीछे हटने के बजाय संघर्ष को और तेज करने का रास्ता चुन सकते हैं.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP