ईरान संकट अमेरिका और इज़राइल की रणनीति का हिस्सा है
तोहरान । डेस्क: ईरान में भड़क उठा मौजूदा जनआंदोलन केवल आर्थिक असंतोष या आंतरिक विरोध का नतीजा नहीं है, बल्कि इसे अमेरिका और इज़राइल की सोची-समझी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है. ईरानी सत्ता प्रतिष्ठान और कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि देश को अंदर से कमजोर करने और सत्ता परिवर्तन की ज़मीन तैयार करने के लिए बाहरी ताकतें हालात को लगातार भड़का रही हैं.
28 दिसंबर को तेहरान के ग्रैंड बाज़ार में दुकानदारों के प्रदर्शन से शुरू हुआ विरोध जल्द ही देशव्यापी आंदोलन में बदल गया. रियाल की ऐतिहासिक गिरावट, महंगाई, बेरोज़गारी, पानी और बिजली की किल्लत ने आम जनता की नाराज़गी को उबाल पर पहुंचा दिया. लेकिन इस आंतरिक संकट को और खतरनाक बनाने का काम अमेरिका की खुली सैन्य धमकियों और इज़राइल की आक्रामक नीति ने किया.
2018 में अमेरिकी प्रतिबंधों की दोबारा शुरुआत के बाद से ईरान की अर्थव्यवस्था लगातार दबाव में है. लाखों लोग अपनी आय की क्रय-शक्ति खो चुके हैं और सरकार पर भ्रष्टाचार व कुप्रबंधन के आरोप बढ़ते गए हैं. सरकार ने केंद्रीय बैंक गवर्नर बदलने और कुछ आर्थिक सुधारों की घोषणा की, लेकिन ये कदम जनता का भरोसा बहाल नहीं कर सके.
इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले और भविष्य में फिर से सैन्य कार्रवाई की धमकियों ने हालात को और विस्फोटक बना दिया. ट्रंप खुले तौर पर यह दावा कर चुके हैं कि वे ईरानी प्रदर्शनकारियों की “मदद” करना चाहते हैं. ईरानी नेतृत्व इसे प्रत्यक्ष हस्तक्षेप और अस्थिरता फैलाने की कोशिश मानता है.
ईरान का आरोप है कि अमेरिका और इज़राइल मिलकर इस जनआंदोलन को 2023 के बाद शुरू हुए क्षेत्रीय युद्धों की अगली कड़ी के रूप में देख रहे हैं. हाल ही में इज़राइल के साथ हुए संघर्ष और ईरान की रक्षा क्षमताओं को पहुंचे नुकसान के बाद तेहरान को आशंका है कि यह विरोध किसी बड़े सैन्य या राजनीतिक हमले की भूमिका हो सकता है. इसी कारण सेना ने, जो आमतौर पर आंतरिक मामलों से दूरी बनाए रखती है, सरकार के समर्थन में बयान जारी किया है.
विशेषज्ञों के अनुसार, ईरानी सत्ता इस समय दोहरे दबाव में है एक ओर गंभीर आर्थिक संकट और जनता का गुस्सा, दूसरी ओर अमेरिका-इज़राइल की सैन्य और राजनीतिक रणनीति. उनका कहना है कि बाहरी हस्तक्षेप की आशंका ने सरकार के लिए संवाद और सुधार के रास्ते और भी सीमित कर दिए हैं.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ईरान एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है. या तो वह अमेरिका के साथ किसी सीमित समझौते की ओर बढ़े, जैसा वेनेज़ुएला मॉडल में देखा गया, या फिर लगातार बिगड़ती अर्थव्यवस्था, बार-बार होने वाले जनआंदोलनों और बाहरी दबावों के बीच सत्ता की स्थिरता को गंभीर खतरे का सामना करे.