अमेरिकी नौसेना की घेराबंदी के जवाब में ईरान ने होरमुज बंद किया
नई दिल्ली । डेस्क: रणनीतिक रूप से दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण जलमार्ग, होरमुज जलडमरूमध्य पर ईरान ने एक बार फिर अपना कड़ा नियंत्रण स्थापित कर लिया है. ईरान का यह फैसला सीधे तौर पर अमेरिकी नौसेना द्वारा उसके बंदरगाहों की अवैध घेराबंदी का पलटवार है. विडंबना यह है कि जब ईरान ने एक सकारात्मक कदम उठाते हुए इस वैश्विक मार्ग को व्यापार के लिए खोलने की घोषणा कर दी थी, तब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को भी परिपक्वता दिखाते हुए ईरानी बंदरगाहों की घेराबंदी समाप्त कर देनी चाहिए थी.
यदि अमेरिका इस मौके का फायदा उठाकर अपनी सैन्य आक्रामकता को कम करता, तो दुनिया के तमाम देशों के लिए पैदा हुआ ऊर्जा संकट और सुरक्षा का भय फौरी तौर पर हल हो सकता था. लेकिन ट्रंप प्रशासन ने शांति की संभावनाओं पर अपनी बेवजह की शर्तें थोपकर न केवल कूटनीतिक अवसर गंवा दिया, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है.
शनिवार को ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने स्पष्ट किया कि जब तक अमेरिका 'समुद्री डकैती' जैसी गतिविधियों को बंद नहीं करता और ईरान के नौवहन अधिकारों को बहाल नहीं करता, तब तक होरमुज पर उनका सख्त प्रबंधन जारी रहेगा. इस तनाव का सीधा असर व्यापारिक जहाजों पर दिख रहा है.
हालांकि भारत जैसे मित्र देशों के कुछ जहाजों को जाने की अनुमति दी गई, लेकिन भ्रम और असुरक्षा की स्थिति ऐसी है कि कई भारतीय और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाज बीच रास्ते से वापस लौट रहे हैं.
भारत ने अपने जहाजों पर हुई गोलीबारी की घटना के बाद कड़ा रुख अपनाते हुए ईरानी राजदूत को तलब किया है. यह पूरी स्थिति ट्रंप की उस अड़ियल नीति का परिणाम है, जिसमें वे एक तरफ शांति की बात करते हैं और दूसरी तरफ 'बमबारी' की धमकी देकर तनाव को और अधिक हवा देते हैं.
वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि खाड़ी युद्ध के इस साये से दुनिया को जल्द छुटकारा मिल पाएगा. अमेरिकी राष्ट्रपति के रोज बदलते बयानों और नई-नई घोषणाओं ने मामले को सुलझाने के बजाय और अधिक उलझा दिया है.
राष्ट्रपति ट्रंप का एयर फोर्स वन से यह कहना कि वे संघर्ष विराम को आगे नहीं बढ़ाएंगे और फिर से हमले शुरू करेंगे, उनकी उस सोच को दर्शाता है जो कूटनीति के बजाय दबाव की राजनीति पर टिकी है.
ईरान का यह तर्क काफी हद तक जायज प्रतीत होता है कि जब अमेरिका समझौतों और कूटनीति के प्रति गंभीर नहीं है, तो ईरान अपनी सुरक्षा और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए जलमार्ग बंद करने जैसे कठोर कदम उठाने को मजबूर है.
जानकारों का मानना है कि होरमुज में जो अनिश्चितता का माहौल है, उसके पीछे अमेरिकी नेतृत्व की स्पष्ट नीति का अभाव है. एक तरफ मध्यस्थता के जरिए 10 दिनों का समझौता होता है और दूसरी तरफ परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंधों की शर्त थोपकर उस समझौते की नींव ही हिला दी जाती है.
इस अस्थिरता ने वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति को संकट में डाल दिया है. जब तक वाशिंगटन अपनी घेराबंदी की नीति और धमकी भरी भाषा का त्याग नहीं करता, तब तक शांति वार्ता की मेज पर ईरान को लाना असंभव होगा.
फिलहाल, खाड़ी में मंडरा रहे युद्ध के बादल और गहरा गए हैं, जिससे भारत सहित उन तमाम देशों की चिंताएं बढ़ गई हैं जिनकी ऊर्जा सुरक्षा इसी संकीर्ण जलमार्ग पर टिकी है. अमेरिकी प्रशासन की वर्तमान कार्यशैली ने शांति की हर छोटी उम्मीद को फिलहाल अनिश्चितता की भेंट चढ़ा दिया है.