बांग्लादेश में अस्थिरता: 1971 के बाद भारत के सामने सबसे बड़ा सुरक्षा संकट
नई दिल्ली । डेस्क: बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद शुरू हुआ अस्थिरता का दौर एक बार फिर हिंसक हो गया है. कट्टरपंथी इस्लामी नेता शरीफ उस्मान हादी की मौत के बाद पूरे देश में तनाव फैल गया है, जिसकी परिणति भारत विरोधी प्रदर्शनों, राजनयिक केंद्रों पर हमलों और अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाने के रूप में हो रही है.
इस बिगड़ते हालात पर भारत की संसदीय स्थायी समिति ने गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इसे 1971 के बाद की सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती करार दिया है.
ताजा हिंसा की आग उस समय भड़की जब 'इन्कलाब मंच' के प्रवक्ता और प्रमुख भारत विरोधी आवाज माने जाने वाले शरीफ उस्मान हादी की सिंगापुर के एक अस्पताल में मौत हो गई. उन पर अज्ञात नकाबपोशों ने हमला किया था.
हादी की मौत के बाद प्रदर्शनकारियों ने ढाका, राजशाही और खुलना में भारतीय वीजा केंद्रों को निशाना बनाया, जिससे वहां कामकाज ठप करना पड़ा. इसी दौरान मयमनसिंह जिले में ईशनिंदा के आरोप में एक हिंदू युवक की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई, जबकि कई मीडिया संस्थानों के दफ्तरों में आगजनी की गई.
भारत की संसदीय समिति के अध्यक्ष और सांसद शशि थरूर ने चेतावनी दी है कि बांग्लादेश में चल रहा यह घटनाक्रम केवल अस्थायी अस्थिरता नहीं, बल्कि एक गहरा पीढ़ीगत और राजनीतिक बदलाव है. समिति की रिपोर्ट के अनुसार, युवाओं के बीच बढ़ता कट्टरपंथ और पाकिस्तान-चीन का प्रभाव भारत के लिए दीर्घकालिक खतरा बन सकता है.
पूर्व राजनयिक वीणा सीकरी ने भी इस स्थिति के लिए पाकिस्तान और जमात-ए-इस्लामी को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा है कि बाहरी ताकतें बांग्लादेश की सेना और राजनीति में पैठ बनाने की कोशिश कर रही हैं. फरवरी में होने वाले आम चुनावों से पहले बढ़ती यह ध्रुवीकरण की राजनीति और हिंसा न केवल बांग्लादेश के लोकतंत्र बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के रणनीतिक संतुलन के लिए कड़ी परीक्षा साबित होने वाली है.