बिना औद्योगीकरण के भारत का 'स्पीड कैपिटलिज्म' AI युग में घातक
नई दिल्ली । डेस्क: दक्षिण कोरिया के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री हा-जून चांग ने भारत की तेजी से अपनाई जा रही पूंजीवादी विकास मॉडल को "गहराई से अपूर्ण और जोखिमपूर्ण" करार देते हुए चेतावनी दी है. फ्रंटलाइन पत्रिका को दिए एक विशेष साक्षात्कार में चांग ने कहा कि भारत बिना जरूरी औद्योगीकरण के चरणों को पार किए सीधे सेवा क्षेत्र पर कूद रहा है, जो न केवल भ्रामक है बल्कि लंबे समय में देश के लिए खतरनाक साबित होगा. उन्होंने इसे "स्पीड रनिंग कैपिटलिज्म" का नाम दिया, जो भारत को आर्थिक असमानता और नौकरियों के संकट की ओर धकेल सकता है.
औद्योगिक आधार की कमी: विकास का मूल आधार गायब
चांग ने स्पष्ट शब्दों में कहा, "भारत वास्तव में औद्योगीकरण के चरण में पहुंचा ही नहीं है." ऐतिहासिक रूप से भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में विनिर्माण क्षेत्र का योगदान पिछले कुछ दशकों से 12-13 प्रतिशत के बीच सीमित रहा है. इसके विपरीत, जापान, दक्षिण कोरिया, चीन, वियतनाम और यहां तक कि कुछ अफ्रीकी देशों ने मध्यम आय के जाल से बाहर निकलने के लिए उद्योग को अपनी मुख्य आधारशिला बनाया.
चांग के अनुसार, औद्योगीकरण केवल उत्पादन वृद्धि नहीं लाता, बल्कि यह कृषि से श्रमिकों को उच्च उत्पादकता वाले क्षेत्रों में स्थानांतरित करता है. इससे मजदूरी में वृद्धि, तकनीकी कौशल अर्जन, उत्पादक रोजगार सृजन और समग्र आर्थिक स्थिरता हासिल होती है. भारत में इसकी कमी से विकास असंतुलित हो रहा है, जो भविष्य में बड़ी चुनौतियां पैदा कर सकता है.
AI युग में सेवा-निर्भर अर्थव्यवस्था का खतरा
भारत की अर्थव्यवस्था जहां आईटी, कॉल सेंटर, आउटसोर्स कोडिंग और कम मूल्य की सेवाओं पर निर्भर है, वहां चांग ने विशेष चेतावनी दी है. उन्होंने कहा, "वह सेवा क्षेत्र जिस पर भारत गर्व करता है, वही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का सबसे बड़ा शिकार बनेगा." AI तेजी से इन क्षेत्रों पर कब्जा कर लेगा, जिससे लाखों नौकरियां खतरे में पड़ सकती हैं.
दूसरी ओर, मजबूत औद्योगिक आधार वाले देश AI को उत्पादकता बढ़ाने वाली शक्ति के रूप में इस्तेमाल कर पाएंगे. लेकिन औद्योगीकरण के बिना, भारत जैसे देश बड़े पैमाने पर रोजगार हानि का सामना करेंगे. चांग ने जोर देकर कहा कि सेवा-केंद्रित मॉडल AI क्रांति में भारत को पिछड़ने का जोखिम दे रहा है.
कॉर्पोरेट एलीट की मानसिकता पर तीखा प्रहार
चांग ने भारत के औद्योगिक-विरोधी आर्थिक चरित्र के पीछे राज्य की उदासीनता के साथ-साथ कॉर्पोरेट और वित्तीय अभिजात वर्ग के व्यवहार को मुख्य कारण बताया. उन्होंने कहा कि भारतीय उद्योगपतियों का बड़ा हिस्सा अल्पकालिक लाभ की ओर झुका हुआ है. दीर्घकालिक औद्योगिक निवेश, अनुसंधान, नवाचार और श्रमिक कौशल विकास जैसे मुद्दों को महत्व नहीं दिया जा रहा. यह प्रवृत्ति भारत को उत्पादन-उन्मुख अर्थव्यवस्था के बजाय वित्तीय सट्टेबाजी चालित "शेयरधारक पूंजीवाद" की राह पर धकेल रही है.
समाधान: विकासवादी राज्य मॉडल और सक्रिय औद्योगिक नीति अपनाएं
इस स्थिति में चांग ने "विकासवादी राज्य" (डेवलपमेंटल स्टेट) मॉडल की सिफारिश की, जहां सरकार दीर्घकालिक योजना, सब्सिडी, सुरक्षा नीतियां और सक्रिय औद्योगिक ध्यान दे. जरूरत पड़ने पर वित्तीय दमन (फाइनेंशियल रेप्रेशन) जैसे उपायों से भी औद्योगिक निवेश को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. उन्होंने निष्कर्ष निकाला, "औद्योगिक नीति के बिना कोई देश टिकाऊ आर्थिक शक्ति नहीं बन सकता. अगर भारत रास्ता नहीं बदलता, तो तकनीक-निर्भर विश्व में वह सबसे बड़े प्रभावित देशों में से एक बन जाएगा."
हा-जून चांग का यह साक्षात्कार केवल अर्थशास्त्रियों की चर्चा का विषय नहीं, बल्कि भारत के विकास के भविष्य पर एक गहन चेतावनी है. प्रौद्योगिकी, पूंजीवाद और वैश्वीकरण की द्रुतगति की दौड़ में भाग लेने से पहले भारत के सामने मुख्य सवाल है क्या औद्योगिक आधार पर आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित की जाएगी, या सेवा-निर्भर अस्थिर विकास के जोखिम पर दांव लगाया जाएगा?
भारत की आगामी आर्थिक नीतियां और राजनीतिक फैसले इसी सवाल का जवाब तय करेंगे.