बांग्लादेश चुनाव में Gen Z कैसे पिछड़ गया
ढाका । डेस्क: बांग्लादेश के हालिया आम चुनाव के नतीजों ने एक हैरान करने वाला राजनीतिक विरोधाभास पैदा कर दिया है. जिस 'जेन-जी' (Gen Z) पीढ़ी ने 2024 के ऐतिहासिक जन-विद्रोह का नेतृत्व किया और 1,400 से अधिक प्राणों की आहुति देकर शेख हसीना के 15 साल पुराने शासन को उखाड़ फेंका, वही युवा पीढ़ी चुनावी बिसात पर पूरी तरह पिछड़ गई है. विद्रोह की कोख से जन्मी युवाओं की प्रतिनिधि 'नेशनल सिटीजन पार्टी' (NCP) को 350 सदस्यीय संसद में केवल 6 सीटों पर संतोष करना पड़ा है.
गौरतलब है कि बांग्लादेश की संसद, जिसे जातीय संसद कहा जाता है, में कुल 350 सीटें हैं. जिसमें से 300 सीटें सीधे मतदान द्वारा चुनी जाती हैं, जो विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करती हैं. 50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं, जिन्हें सीधे निर्वाचित 300 सदस्य आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर चुनते हैं.
बांग्लादेश की कुल 17.3 करोड़ की आबादी दुनिया की सबसे युवा आबादियों में से एक है. चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, देश के कुल वोट बैंक का लगभग 44 प्रतिशत हिस्सा यानी 5.6 करोड़ मतदाता 18 से 37 वर्ष की आयु के हैं. विशेषज्ञों का अनुमान था कि यदि यह विशाल युवा वर्ग अपनी 'क्रांति' के नायकों के साथ खड़ा होता, तो बांग्लादेश की राजनीति का चेहरा पूरी तरह बदल जाता. लेकिन नतीजों ने साफ कर दिया कि प्रदर्शनों में सड़क पर उतरने वाले युवाओं ने मतदान केंद्र के भीतर अपनी ही पार्टी के बजाय पुरानी और स्थापित 'बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी' (BNP) को वोट देना ज्यादा सुरक्षित समझा.
चुनाव परिणामों के अनुसार, मतदाताओं ने भारी बहुमत के साथ तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बीएनपी को चुना है. बीएनपी ने जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले उस गठबंधन को करारी शिकस्त दी, जिसमें युवाओं की NCP एक प्रमुख भागीदार थी. अब तारिक रहमान बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने को तैयार हैं. उन्होंने शांति और व्यवस्था बनाए रखने का वादा करते हुए कहा है कि उनकी सरकार में किसी भी तरह के अन्याय को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.
राजनीतिक विश्लेषकों और खुद युवा मतदाताओं के अनुसार, Gen Z की पार्टी के पिछड़ने के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण रहे हैं.
23 वर्षीय छात्र सोहनुर रहमान जैसे कई युवाओं का मानना है कि NCP का 'जमात-ए-इस्लामी' के साथ गठबंधन करना एक बड़ी रणनीतिक भूल थी. जो युवा एक 'नई राजनीति' और 'धर्मनिरपेक्ष भविष्य' का सपना देख रहे थे, उन्हें पुराने कट्टरपंथी दलों के साथ युवाओं का हाथ मिलाना एक 'विश्वासघात' जैसा लगा.
जहाँ बीएनपी दशकों से जमीन पर मजबूत संगठन और कार्यकर्ता आधार रखती है, वहीं NCP एक नई पार्टी थी. युवाओं के पास आंदोलन का जोश तो था, लेकिन वे कम समय में देश के कोने-कोने तक अपना नेटवर्क नहीं फैला सके.
शेख हसीना के पतन के बाद देश महीनों तक उथल-पुथल और हिंसा के दौर से गुजरा. ऐसे में आम जनता और यहां तक कि कई युवा मतदाताओं को लगा कि बीएनपी जैसी अनुभवी पार्टी ही देश में स्थिरता और कानून का शासन बहाल कर सकती है.
भले ही NCP को केवल 6 सीटें मिली हों, लेकिन छात्र नेता और पार्टी प्रवक्ता आसिफ महमूद का कहना है कि वे हार नहीं मानेंगे. पार्टी अब विपक्ष में बैठकर खुद को मजबूत करेगी और अगले साल होने वाले स्थानीय निकाय चुनावों पर ध्यान केंद्रित करेगी.
कुल मिलाकर, ये चुनाव परिणाम दर्शाते हैं कि सड़क पर क्रांति लाना एक बात है और उसे चुनावी जीत में बदलना बिल्कुल दूसरी चुनौती. बांग्लादेश के युवाओं ने बदलाव की शुरुआत तो कर दी है, लेकिन सत्ता की चाबी फिलहाल अनुभवी हाथों में ही सौंपी है.