क्या पश्चिम एशिया के लिये अमेरिका भरोसेमंद नहीं रहा ?
नई दिल्ली । डेस्क: पश्चिम एशिया की सुरक्षा को लेकर लंबे समय से चला आ रहा अमेरिका केंद्रित खाड़ी ढांचा अब चरमरा चुका है. कभी वाशिंगटन के 'सुरक्षा छाते' पर आंख मूंदकर भरोसा करने वाले देश अब यह मान चुके हैं कि अमेरिकी दबदबे का युग समाप्त हो रहा है. सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए के बीच मक्का में हुआ ऐतिहासिक त्रि-स्तरीय रक्षा समझौता (Mecca Joint Defence Agreement) इस बात का सीधा प्रमाण है कि क्षेत्रीय शक्तियां अब अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका के भरोसे रहने को तैयार नहीं हैं.
अमेरिका और ईरान के बीच भड़के सीधे संघर्ष ने पश्चिम एशिया में वाशिंगटन की सैन्य सीमाओं और उसके ठिकानों की संवेदनशीलता को पूरी तरह उजागर कर दिया है. खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हुए हमलों ने यह साबित कर दिया कि अमेरिका अब इस क्षेत्र की सुरक्षा की बिना शर्त गारंटी देने की स्थिति में नहीं है.
संसाधनों की कमी और बदलती वैश्विक प्राथमिकताओं के कारण वाशिंगटन के लिए इस क्षेत्र में अपनी विशाल सैन्य उपस्थिति बनाए रखना मुश्किल हो रहा है, जिससे कई अमेरिकी बेस बंद होने की कगार पर हैं.
इसी अविश्वास और सुरक्षा रिक्ति को भरने के लिए सऊदी अरब ने 'रणनीतिक धैर्य' का रास्ता छोड़कर खुद को क्षेत्रीय सुरक्षा के केंद्र के रूप में स्थापित कर लिया है. मक्का में हुए इस समझौते के तहत प्रावधान किया गया है कि गठबंधन के किसी भी एक देश पर सैन्य हमला सभी तीन देशों पर हमला माना जाएगा.
यह नई व्यवस्था पश्चिम एशिया के सबसे शक्तिशाली देशों सऊदी अरब की आधुनिक वायुसेना व वित्तीय ताकत, पाकिस्तान की मजबूत थलसेना व परमाणु क्षमता और तुर्किए के नाटो-स्तरीय रक्षा उद्योग को एक रक्षा मंच पर ले आई है.
यह उभरता हुआ ढांचा केवल ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव को सीमित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इजराइल की सैन्य मनमानियों पर भी लगाम कसने का एक प्रयास है.
कतर पर हुए हालिया हमलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि खाड़ी देश अब अपनी सीमाओं के भीतर किसी भी बाहरी हस्तक्षेप या अनियंत्रित सैन्य आक्रामकता को स्वीकार नहीं करेंगे.
अमेरिका भले ही पूरी तरह से क्षेत्र से बाहर न हो, लेकिन उसके बिना एक आत्मनिर्भर सुरक्षा तंत्र का निर्माण अब एक हकीकत बन चुका है.
बहरीन, कुवैत और कतर जैसे अन्य खाड़ी देश भी अब एक बड़े 'गल्फ यूनियन' और सऊदी-केंद्रित सुरक्षा घेरे की ओर आकर्षित हो रहे हैं. यह नया समीकरण साफ संकेत देता है कि पश्चिम एशिया अब अमेरिकी सैन्य शक्ति का मोहताज बनकर रहने के बजाय अपने भविष्य और सुरक्षा के फैसले खुद लेने के मार्ग पर आगे बढ़ चुका है.