GST स्कैम: छत्तीसगढ़ HC से अकाउंटेंट को मिली अग्रिम ज़मानत
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में रायपुर स्थित फ्रीलांस अकाउंटेंट मोहम्मद फरहान को अग्रिम ज़मानत दे दी है. जिन पर फर्जी जीएसटी पंजीकरण कराने और ₹124 करोड़ की जीएसटी चोरी से जुड़े नकली ई-वे बिल जारी करने में मदद करने का आरोप है.
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की पीठ ने 10 दिसंबर को पारित अपने आदेश में कहा कि आरोपी को अग्रिम ज़मानत देना उचित है, क्योंकि "आरोप की प्रकृति, साक्ष्यों का स्वरूप, जांच का चरण, अधिकतम निर्धारित सज़ा, और हिरासत में पूछताछ की अपरिहार्यता सिद्ध न हो पाना" जैसे कई कारण हैं.
मोहम्मद फरहान पर कथित तौर पर ₹821 करोड़ के लेन-देन और ₹124 करोड़ के टैक्स चोरी से जुड़ी फर्जी फर्म बनाने और नकली ई-वे बिल की सुविधा देने का आरोप है. फरहान के वकील विकल्प शर्मा ने बार-बार समन और "तलाशी के लिए ज़बरन तरीके" को रेखांकित करते हुए, "गिरफ्तारी की वास्तविक आशंका" के आधार पर अग्रिम ज़मानत मांगी थी.
जघन्य अपराध की श्रेणी में नहीं हाई कोर्ट ने इस बात पर गौर किया कि आरोपी के खिलाफ आरोप मुख्य रूप से दस्तावेजी और डिजिटल साक्ष्यों पर आधारित हैं, जो पहले से ही जांच एजेंसी के कब्ज़े में हैं. कोर्ट ने यह भी नोट किया कि कथित अपराध के लिए अधिकतम सज़ा केवल पांच साल है.
आदेश में कहा गया है कि, "यह अपराध जघन्य या हिंसक अपराधों की श्रेणी में नहीं आता है जिसके लिए आमतौर पर मुकदमे से पहले कारावास ज़रूरी हो. सज़ा की सीमित वैधानिक गंभीरता, आरोपों की प्रकृति के साथ मिलकर, इस चरण में हिरासत में लेने की आवश्यकता के विरुद्ध है."
न्यायमूर्ति सिन्हा ने कहा कि प्रासंगिक डेटा पहले ही ज़ब्त किया जा चुका है और जांच में समय लगेगा. आदेश में कहा गया है कि "उचित शर्तों के साथ आरोपी की निरंतर स्वतंत्रता से भागने या साक्ष्य से छेड़छाड़ का कोई जोखिम नहीं है."
वकील शर्मा ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल ने केवल एक फ्रीलांस अकाउंटेंट के रूप में अपने पेशेवर कर्तव्यों का निर्वहन किया है और वह निर्दोष है. उन्होंने कहा कि "आरोप अतिरंजित हैं, किसी भी विश्वसनीय सामग्री से समर्थित नहीं हैं, और पूरी तरह से संदेह और अनुमान पर आधारित हैं."
शर्मा ने यह भी तर्क दिया कि जीएसटी पंजीकरण एक पूरी तरह से सिस्टम-संचालित प्रक्रिया है, जिसमें आधार ओटीपी प्रमाणीकरण, भौतिक सत्यापन और विस्तृत जांच के बाद अनुमोदन शामिल है, इसलिए उनके मुवक्किल के स्तर पर जालसाज़ी असंभव है.
राज्य ने दिया था विरोध उप महाधिवक्ता यूकेएस चंदेल, जो राज्य की ओर से पेश हुए, ने तर्क दिया कि आरोपी 21 गैर-मौजूद फर्मों से जुड़ा था, जिनका इस्तेमाल केवल ₹821 करोड़ के ई-वे बिल जारी करने और पहचान की चोरी के लिए किया गया था. चंदेल ने कहा कि यह मामला आर्थिक अपराध की संगठित प्रकृति, साक्ष्य के विनाश और कई संस्थाओं की संलिप्तता के मद्देनज़र "पूरी श्रृंखला का पता लगाने और डेटा बरामद करने" के लिए हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता पर बल दिया.
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि आरोपी को पांच समन जारी किए जाने के बावजूद वह एक बार भी पेश नहीं हुआ और जांच में बाधा डाल रहा है, जो अभी भी "शुरुआती और संवेदनशील चरण" में है.
यह रिकॉर्ड पर आया कि केंद्रीय जीएसटी अधिकारियों ने जीएसटी पंजीकरण से संबंधित कुछ दस्तावेज़ और डिजिटल रिकॉर्ड ज़ब्त किए और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर तलाशी लेने के बाद आरोपी के परिसर से ₹2.48 लाख बरामद किए.
विभाग ने आरोपी को तीन लगातार समन जारी किए थे, लेकिन वह अधिकारियों के सामने पेश नहीं हुआ, जिसके बाद उसने सत्र न्यायालय में अग्रिम ज़मानत के लिए संपर्क किया, जिसे खारिज कर दिया गया था.