धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा: वैश्विक मीडिया ने बताया जेन-जेड की ऐतिहासिक जीत
नई दिल्ली । डेस्क: अदालत की एक तल्ख टिप्पणी और सोशल मीडिया पर उठे एक सवाल से शुरू हुआ युवाओं का असंतोष भारत में हाल के वर्षों का सबसे बड़ा और शक्तिशाली छात्र आंदोलन बन गया. लगातार 36 दिनों तक सड़कों पर डटे लाखों युवाओं और 26 दिनों की लंबी भूख हड़ताल के बाद आखिरकार केंद्र सरकार को पीछे हटना पड़ा है.
नीट (NEET) परीक्षा धांधली और शिक्षा प्रणाली की कमियों के विरोध में चल रहे इस व्यापक आंदोलन के दबाव में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. अंतरराष्ट्रीय मीडिया इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के लिए एक दुर्लभ और ऐतिहासिक 'राजनीतिक बैकट्रैक' के रूप में देख रहा है.
आंदोलन की शुरुआत तब हुई जब 'एक्स' पर युवा कार्यकर्ता अभिजीत दीपके ने पूछा, "क्या हो अगर सभी कॉकरोच एक साथ आ जाएं?" यह सवाल चीफ जस्टिस सूर्यकांत की उस अदालती टिप्पणी के विरोध में उभरा था, जिसमें बेरोजगार युवाओं की तुलना कथित रूप से 'कॉकरोच' से की गई थी.
भारतीय युवाओं ने इस अपमानजनक शब्द को ही अपनी अस्मिता और विरोध का सबसे बड़ा प्रतीक बना लिया. देखते ही देखते देश भर के युवा हाथ में पोस्टर, तख्तियां और मीम्स लेकर सड़कों पर उतर आए. जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक का आमरण अनशन और पुलिस द्वारा उन्हें जबरन सफदरजंग अस्पताल ले जाए जाने के बावजूद छात्रों का हौसला नहीं डिगा.
वैश्विक मीडिया ने इस आंदोलन और इसके असर का विस्तृत विश्लेषण किया है. 'द न्यू यॉर्क टाइम्स' ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को सरकार का "एक दुर्लभ कदम" बताते हुए लिखा कि यद्यपि इसका तात्कालिक कारण नीट विवाद था, लेकिन यह प्रदर्शन युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी, चरमराती शिक्षा व्यवस्था और घटते अवसरों के खिलाफ जमा हुए गहरे असंतोष का विस्फोट है.
'बीबीसी' ने अपने विस्तृत रिपोर्टिंग में 'कॉकरोच' शब्द के प्रतीकात्मक रूपांतरण पर ध्यान केंद्रित किया. बीबीसी ने जंतर-मंतर के जश्न के माहौल का जिक्र करते हुए लिखा कि जिस अपमानजनक शब्द से युवाओं को नीचा दिखाने की कोशिश की गई थी, उसे छात्रों ने अपनी स्वाभिमानी पहचान बना लिया.
बीबीसी के अनुसार, हफ्तों के संघर्ष के बाद जीत की खुशी में प्रदर्शन स्थल उत्सव के केंद्र में बदल गया, जहां भारी पुलिस बल की मौजूदगी के बावजूद युवा जीत का जश्न मनाते दिखे.
'फाइनेंशियल टाइम्स' ने इस आंदोलन को मोदी सरकार के समृद्धि के वादों की परीक्षा करार दिया. अखबार ने लिखा कि आज के भारत में राजनीतिक जवाबदेही की अवधारणा गायब हो चुकी थी और पुरानी पीढ़ी ने इसे सामान्य मान लिया था, लेकिन चुनौतियों से जूझ रही जेन-जेड (Gen-Z) पीढ़ी ने इसे स्वीकार नहीं किया.
मोदी द्वारा 12 साल पहले हर साल 2 करोड़ नौकरियां देने, 100 नए शहर बनाने और "नव-मध्यम वर्ग" बनाने के जो वादे किए गए थे, वे युवाओं के लिए पूरे नहीं हुए.
'ब्लूमबर्ग' ने इसे "कीड़े के नाम से शुरू हुआ सोशल मीडिया जोक" बताया, जो मोदी सरकार के लिए अब तक का सबसे बड़ा सिरदर्द बन गया. वैश्विक मीडिया का मानना है कि मीम्स और डिजिटल हथियारों से लैस इस पीढ़ी ने साबित कर दिया कि जब जवाबदेही पर सवाल उठते हैं, तो युवा शक्ति किसी भी सरकार को झुकने पर मजबूर कर सकती है.