दिल्ली उच्च न्यायालय ने पतंजलि के विज्ञापन पर लगाई रोक
नई दिल्ली । डेस्क: दिल्ली उच्च न्यायालय ने पतंजलि आयुर्वेद को उस विज्ञापन के प्रसारण से रोक दिया है जिसमें अन्य च्यवनप्राश ब्रांडों को 'धोखा' बताया गया था. उच्च न्यायालय ने कंपनी को इसे सभी इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल और प्रिंट माध्यमों से हटाने का निर्देश दिया है.
न्यायमूर्ति तेजस करिया ने कहा कि यह सुझाव देना कि केवल पतंजलि का च्यवनप्राश ही असली है जबकि अन्य भ्रामक हैं, "गलत है और आयुर्वेदिक उत्पादों के पूरे वर्ग को बदनाम करता है." यह अंतरिम आदेश डाबर इंडिया की याचिका पर आया था, जिसमें पतंजलि के 25 सेकंड के विज्ञापन "51 हर्ब्स. 1 ट्रुथ. पतंजलि च्यवनप्राश!" को चुनौती दी गई थी. विज्ञापन में रामदेव दावा करते हैं कि "अधिकांश लोग च्यवनप्राश के नाम पर धोखा खा रहे हैं."
उच्च न्यायालय ने अपने 37-पृष्ठ के आदेश में कहा कि रामदेव, जो योग और वैदिक प्रथाओं पर एक जाने-माने प्राधिकारी हैं, उनकी उपस्थिति और उनके दावे से दर्शकों पर एक मजबूत छाप पड़ने की संभावना है कि केवल उनका उत्पाद ही असली च्यवनप्राश है.
अदालत ने कहा कि विज्ञापन अपनी प्रकृति और अंतर्निहित इरादे, दोनों में च्यवनप्राश उत्पादों की पूरी श्रेणी को बदनाम करने की कोशिश करता है. हालांकि पतंजलि ने विशेष रूप से डाबर उत्पाद को लक्षित नहीं किया, लेकिन उसने अपने उत्पाद के अलावा हर दूसरे च्यवनप्राश को 'धोखा' कहा, और च्यवनप्राश में मार्केट लीडर होने के नाते डाबर के इस निंदात्मक विज्ञापन से प्रभावित होने की संभावना है.
उच्च न्यायालय ने माना कि प्रथम दृष्टया मामला डाबर के पक्ष में है और यदि अंतरिम निषेधाज्ञा नहीं दी गई तो डाबर को अपूरणीय क्षति होगी. अदालत ने पतंजलि को तत्काल प्रभाव से किसी भी मीडिया रूप में विज्ञापन जारी करने, प्रसारित करने या प्रचारित करने से रोक दिया और इसे तीन दिनों के भीतर सभी माध्यमों से हटाने या अक्षम करने का भी निर्देश दिया.
पतंजलि ने तर्क दिया था कि यह विज्ञापन केवल उनके उत्पाद को उजागर करता है और 'धोखा' शब्द का उपयोग रचनात्मक अभिव्यक्ति या बढ़ा-चढ़ाकर बताने के रूप में किया गया था, जिसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(a)) के तहत संरक्षित किया गया है. हालांकि, अदालत ने कहा कि विज्ञापन अनुमेय बढ़ा-चढ़ाकर बताने की सीमा को पार कर गया है और अन्य सभी च्यवनप्राश उत्पादों को भ्रामक कहना निंदा के समान है.
अदालत ने टिप्पणी की कि जबकि विज्ञापनकर्ता अपने उत्पादों की प्रशंसा करने के लिए स्वतंत्र हैं, वे प्रतिस्पर्धा करने वाले उत्पादों के पूरे वर्ग को बदनाम नहीं कर सकते, खासकर जब ऐसे बयान उपभोक्ताओं को गुमराह कर सकते हैं.