बदलते दौर में रूस-चीन की गहरी होती साझेदारी और पुतिन का बीजिंग दौरा
बीजिंग । डेस्क: रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन मंगलवार शाम दो दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर चीन पहुंचे. यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब यूक्रेन युद्ध, पश्चिमी प्रतिबंधों और वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव के बीच मॉस्को और बीजिंग के रिश्ते लगातार गहरे हो रहे हैं. दोनों नेताओं के बीच यह मुलाकात बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जो रूस और चीन के बीच '2001 की आपसी मित्रता और सहयोग संधि' की 25वीं वर्षगांठ के अवसर पर हो रही है.
दिलचस्प बात यह है कि पुतिन का यह दौरा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बीजिंग यात्रा के ठीक बाद हो रहा है. विश्लेषकों का मानना है कि वाशिंगटन की अप्रत्याशित विदेश नीति ने रूस और चीन को एक-दूसरे के और करीब ला दिया है.
1. शीत युद्ध की कड़वाहट से रणनीतिक साझेदारी तक का सफर
चीन और रूस के ऐतिहासिक संबंध हमेशा सरल नहीं रहे हैं. कभी कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े ये दोनों देश शीत युद्ध के दौरान अपनी 4,300 किलोमीटर लंबी सीमा पर आमने-सामने आ गए थे और दोनों के बीच सैन्य संघर्ष जैसी स्थिति बन गई थी. हालांकि, समय के साथ इस विवादित सीमा ने रणनीतिक सहयोग और व्यापार के एक नए गलियारे का रूप ले लिया है. आज दोनों नेता एक-दूसरे को "मित्र" कहकर संबोधित करते हैं. विशेष रूप से 2022 में यूक्रेन पर रूसी आक्रमण के बाद, अंतरराष्ट्रीय अलगाव से बचने के लिए मॉस्को ने दक्षिण-पूर्व की ओर रुख किया है.
2. रूस के लिए चीन बना 'आर्थिक जीवनरेखा'
पश्चिमी प्रतिबंधों से घिरे रूस के लिए चीन इस समय सबसे बड़ा सहारा साबित हो रहा है. वर्ष 2020 से 2024 के बीच दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार दोगुने से अधिक बढ़कर 237 अरब डॉलर तक पहुंच गया है. वर्तमान में रूस अपनी स्वीकृत (sanctioned) तकनीकों का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा चीन से आयात कर रहा है, जिसमें ड्रोन उत्पादन और रक्षा उद्योगों के लिए आवश्यक दोहरे उपयोग वाले उपकरण शामिल हैं. इसके अलावा, यूरोपीय बाजारों के बंद होने के बाद चीन रूसी तेल और गैस का सबसे बड़ा खरीदार बनकर उभरा है.
3. असमान आर्थिक ताकत और बीजिंग का दबदबा
भले ही यह साझेदारी दोनों देशों के लिए जरूरी हो, लेकिन इसका झुकाव चीन की तरफ ज्यादा है. रूस के लिए चीन सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है, लेकिन चीन के कुल वैश्विक व्यापार में रूस की हिस्सेदारी महज चार प्रतिशत है. इस विशाल आर्थिक अंतर के कारण चीन बातचीत में मजबूत स्थिति में रहता है और वह रूस से रियायती दरों पर कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति सुनिश्चित करने में सफल रहा है.
4. चीन को क्यों है रूस की जरूरत?
यह रिश्ता पूरी तरह से एकतरफा भी नहीं है. वर्तमान में ईरान के आसपास बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री जहाजों पर हमलों के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार संकट में है. ऐसे में चीन को अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूस जैसे सुरक्षित जमीनी मार्ग वाले आपूर्तिकर्ता की सख्त जरूरत है. यही कारण है कि इस बैठक में 'पावर ऑफ साइबेरिया 2' पाइपलाइन परियोजना पर विशेष चर्चा होने की उम्मीद है, जिसके माध्यम से सालाना 50 अरब घन मीटर रूसी गैस मंगोलिया के रास्ते चीन पहुंचेगी.
5. बिना सैन्य गठबंधन के मजबूत रक्षा और कूटनीतिक संबंध
आर्थिक हितों से इतर, दोनों देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य के रूप में अमेरिकी नीतियों के खिलाफ कूटनीतिक रूप से एक साथ खड़े रहते हैं. हालांकि चीन किसी औपचारिक सैन्य गठबंधन में शामिल होने से बच रहा है, लेकिन दोनों सेनाएं 2012 से लगातार संयुक्त नौसैनिक अभ्यास कर रही हैं. हाल ही में जापान सागर में पनडुब्बी रोधी और वायु रक्षा प्रणालियों को लेकर किए गए युद्धाभ्यास ने यह साफ कर दिया है कि बिना किसी औपचारिक रक्षा वादे के भी दोनों देश एक-दूसरे के कितने करीब हैं.
विशेषज्ञों के अनुसार, इस रिश्ते की सबसे बड़ी ताकत इसकी लचीली प्रकृति है. पश्चिमी देश भले ही इसे एक अस्थायी मेलजोल के रूप में देखें, लेकिन केवल खोखली विचारधारा के बजाय ठोस आर्थिक और रणनीतिक हितों पर टिके होने के कारण यह साझेदारी भविष्य में अधिक टिकाऊ साबित हो सकती है.