क्रिप्टो फ्रॉड: मुंबई कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के दो आरोपियों की गिरफ्तारी को बताया अवैध, रिहाई का आदेश
क्रिप्टोकरेंसी निवेश धोखाधड़ी मामले में अनिवार्य कानूनी प्रक्रियाओं और सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का पालन न करने पर मुंबई की अदालत ने छत्तीसगढ़ के दो आरोपियों की गिरफ्तारी को अवैध ठहराते हुए रिहाई के आदेश जारी किए.
मुंबई । डेस्क: मुंबई की एक अदालत ने हाल ही में क्रिप्टोकरेंसी निवेश धोखाधड़ी के मामले में छत्तीसगढ़ के दो निवासियों की गिरफ्तारी को "अवैध" घोषित करते हुए उनकी रिहाई का आदेश दिया है. अदालत ने पाया कि पुलिस ने गिरफ्तारी के दौरान अनिवार्य कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया. इसके साथ ही मजिस्ट्रेट ने जांच एजेंसी की इस लापरवाही पर "सूचना और आवश्यक कार्रवाई" के लिए संबंधित पुलिस उपायुक्त को आदेश की एक प्रति भेजने का भी निर्देश दिया है.
दोनों व्यक्तियों की रिहाई का निर्देश देते हुए मजिस्ट्रेट ने स्पष्ट किया कि यदि उनकी गिरफ्तारी बिल्कुल आवश्यक रहती है, तो पुलिस कानून और सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के अनुसार सख्ती से कदम उठा सकती है.
मामले के अनुसार, आरोपी वेदप्रकाश कुंजलाल साहू (33) और दौलत सिंह दुलारदास साहू (45) को 2 नवंबर को गिरफ्तारी के बाद न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (कुर्ला कोर्ट) एस एम गौरगोंड के समक्ष पेश किया गया था, जहां पुलिस ने उनकी 10 दिनों की रिमांड मांगी थी.
पुलिस के मुताबिक, दोनों आरोपियों ने 'फ्लो एक्स प्रोटोकॉल प्राइवेट लिमिटेड' नाम की फर्म का प्रतिनिधित्व करने वाले अन्य वांछित आरोपियों के साथ मिलकर कुर्ला के एक 30 वर्षीय स्टॉक और क्रिप्टो ट्रेडर को यूएसडीटी (एक क्रिप्टोकरेंसी) में निवेश करने पर 45 प्रतिशत मासिक रिटर्न का लालच दिया था.
आरोपियों ने विश्वास जीतने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक और भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के जाली पंजीकरण दस्तावेज और फर्जी प्रमाण पत्र दिखाए और इस साल फरवरी से अगस्त के बीच 7.50 लाख रुपये नकद ले लिए.
जब शिकायतकर्ता को न तो वादा किया गया रिटर्न मिला और न ही मूल राशि, तो उसने कुर्ला पुलिस से संपर्क किया, जिसके बाद भारतीय न्याय संहिता की धाराओं 318(2) (धोखाधड़ी), 319(2) (प्रतिरूपण द्वारा धोखाधड़ी), 336(3) (जालसाजी) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के प्रावधानों के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई.
आरोपियों को गोवा से हिरासत में लिया गया था, जहां वे कथित तौर पर एक निवेश संगोष्ठी आयोजित कर रहे थे, और 2 नवंबर को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था.
बचाव पक्ष के वकीलों श्रीगणेश सावलकर और अदिरा टंडन ने रिमांड का विरोध करते हुए तर्क दिया कि पुलिस ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 35(3) (पुलिस अधिकारी के समक्ष उपस्थिति का नोटिस) और 48 (गिरफ्तारी करने वाले व्यक्ति का नामित व्यक्ति को गिरफ्तारी के बारे में सूचित करने का कर्तव्य) के अनिवार्य प्रावधानों का उल्लंघन किया है.
अदालत ने बचाव पक्ष के तर्क को स्वीकार करते हुए उल्लेख किया कि आरोपियों के खिलाफ दर्ज अपराधों में अधिकतम सात साल तक की जेल की सजा का प्रावधान है, जिससे सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का पालन करना अनिवार्य हो जाता है.
इसके अलावा, मजिस्ट्रेट ने रेखांकित किया कि हालांकि आरोपियों को गोवा में हिरासत में लिया गया था, लेकिन जांच अधिकारी अनिवार्य ट्रांजिट रिमांड प्राप्त करने के लिए उन्हें निकटतम स्थानीय मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने में विफल रहे, जो बॉम्बे हाईकोर्ट के एक हालिया फैसले का उल्लंघन है.
मजिस्ट्रेट ने टिप्पणी की कि संबंधित जांच अधिकारी ने बीएनएसएस की धारा 35(3) और 48 के तहत अनिवार्य आवश्यकताओं का पालन नहीं किया है, इसलिए यह गिरफ्तारी कानूनी नहीं है.
इसके साथ ही अदालत ने अभियोजन पक्ष की महाराष्ट्र डिपॉजिटर्स ऑफ इंटरेस्ट ऑफ प्रोटेक्शन (एमपीआईडी) अधिनियम लागू करने की याचिका को भी यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इस अधिनियम के तहत अपराध विशेष अदालत द्वारा अनन्य रूप से विचारणीय हैं.