तृणमूल कांग्रेस में तख्तापलट: ममता-अभिषेक को हटाया
कोलकाता । डेस्क: पश्चिम बंगाल की राजनीति में रविवार को उस समय एक और बड़ा भूचाल आ गया, जब उलुबेरिया पूर्व से विधायक ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले "असली तृणमूल" धड़े ने पार्टी के दूसरे सबसे बड़े नेता अभिषेक बनर्जी को निलंबित कर दिया और ममता बनर्जी को पार्टी के अध्यक्ष पद से हटा दिया.
यह नाटकीय घटनाक्रम ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल द्वारा ऋतब्रत बनर्जी को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित किए जाने के ठीक कुछ दिनों बाद सामने आया है. सोमवार को इस गुट ने जवाबी कार्रवाई करते हुए पार्टी की एक नई समिति का गठन किया और सीधे ममता और अभिषेक बनर्जी पर अनुशासनात्मक कार्रवाई कर दी.
न्यू टाउन के एक होटल में ऋतब्रत गुट की इस महत्वपूर्ण बैठक में करीब 60 विधायक और कोलकाता नगर निगम के 70 पार्षद शामिल हुए. इस बैठक में हावड़ा मध्य के विधायक अरूप रॉय को ममता बनर्जी की जगह पार्टी का नया अध्यक्ष घोषित किया गया. बागी गुट का दावा है कि संगठन के भीतर पैदा हुए "संवैधानिक संकट" को दूर करने के लिए यह बैठक बुलाई गई थी.
ऋतब्रत बनर्जी ने दलील दी कि पार्टी के संविधान के अनुसार हर तीन साल में एक राष्ट्रीय कार्यसमिति का गठन अनिवार्य है, जबकि आखिरी बार इसका गठन फरवरी 2022 में हुआ था. कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी संगठनात्मक ढांचे का नवीनीकरण नहीं किया गया, जिसके चलते पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व को पुनर्गठित करने की प्रक्रिया शुरू करना बेहद जरूरी हो गया था.
इस नई बागी समिति में अरूप बिस्वास, फिरहाद हकीम, रथिन घोष और सबीना यास्मिन को उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया है. इन चारों में से अरूप बिस्वास इकलौते ऐसे नेता हैं जो विधानसभा चुनाव हार गए थे, फिर भी उन्हें नए ढांचे में जगह दी गई है.
पूर्व कोषाध्यक्ष रहे अरूप बिस्वास ने हाल ही में दक्षिण कोलकाता की एक निजी बैंक शाखा में मौजूद तृणमूल कांग्रेस के बैंक खाते को फ्रीज (लेनदेन रोकने) करने के लिए कदम उठाया है, जिसमें कथित तौर पर करीब ₹675 करोड़ जमा हैं.
इस नए घटनाक्रम के बाद तृणमूल कांग्रेस अब स्पष्ट रूप से तीन धड़ों में बंट चुकी है. पहला धड़ा ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल का है. दूसरा ऋतब्रत बनर्जी की "असली टीएमसी" है, जो अब बंगाल विधानसभा में विपक्षी दल की भूमिका में आ गई है. वहीं तीसरा धड़ा पार्टी के करीब दो दर्जन लोकसभा सांसदों का है, जिन्होंने 'नेशनल सिटीजन्स पार्टी' नामक एक छोटे राजनीतिक दल में अपना विलय कर लिया है और संसद में सत्तारूढ़ एनडीए (NDA) को समर्थन दे रहे हैं.
अभिषेक बनर्जी के निलंबन और ममता बनर्जी को हटाए जाने के इस फैसले ने इस भ्रम को और गहरा कर दिया है कि वास्तव में पार्टी का असली नेतृत्व और वैचारिक कोर कौन संभाल रहा है.
इस बीच, बागी सांसदों ने संकेत दिए हैं कि वे पार्टी के आधिकारिक चुनाव चिह्न और लोगो पर दावा ठोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख करेंगे, जबकि पार्टी के ₹1,100 करोड़ के विशाल चुनावी फंड पर किसका अधिकार होगा, इसे लेकर भी सस्पेंस बरकरार है.