सहमति से सेक्स वर्क अपराध नहीं, FIR रद्द: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई वयस्क महिला अपनी सहमति से देह व्यापार (सेक्स वर्क) में शामिल है, तो पुलिस को उसके काम में दखल देने या उसके खिलाफ कोई भी आपराधिक कार्रवाई करने से बचना चाहिए. अदालत ने माना कि ऐसी स्थिति में आपराधिक कार्रवाई जारी रखना एक महिला को उसी उत्पीड़न और प्रताड़ना का शिकार बनाना है, जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने सख्त दिशानिर्देश जारी किए हैं.
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने यह फैसला रायपुर के 'होटल हयात' में पुलिस छापेमारी से जुड़े एक मामले में सुनाया.
याचिकाकर्ता महिला ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत याचिका दाखिल कर अपने खिलाफ अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज प्राथमिकी (FIR) और आरोप पत्र को रद्द करने की मांग की थी.
याचिकाकर्ता का तर्क था कि जब पुलिस ने होटल में छापेमारी की थी, तब वह न तो वहां मौजूद थी और न ही उस स्थान पर रहती थी. उसे बाद में पुलिस स्टेशन बुलाकर झूठा फंसाया गया था.
याचिकाकर्ता ने कहा कि उसके खिलाफ FIR दर्ज करना, गिरफ्तारी करना और चार्जशीट दाखिल करना वयस्क और सहमति से काम करने वाले सेक्स वर्करों के अधिकारों की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देशों के पूरी तरह विपरीत है.
मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले 'बुद्धदेव करमास्कर बनाम पश्चिम बंगाल राज्य' का हवाला दिया. शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा था कि सेक्स वर्करों को भी कानून के तहत समान संरक्षण का अधिकार है. भारत में स्वेच्छा से देह व्यापार करना गैर-कानूनी नहीं है, केवल कोठा (Brothel) चलाना या उस पर कमाई करना गैर-कानूनी है.
इसलिए छापेमारी के दौरान पाई जाने वाली वयस्क सेक्स वर्करों को गिरफ्तार, दंडित या प्रताड़ित नहीं किया जाना चाहिए.
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ ऐसा कोई ठोस आरोप या सबूत नहीं पेश किया गया, जो यह साबित करे कि वह किसी स्वतंत्र आपराधिक गतिविधि में शामिल थी. केवल सेक्स वर्कर होने के आधार पर उस पर मुकदमा चलाना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है.
अदालत ने माना कि इस तरह की कार्यवाही को आगे बढ़ाना उत्पीड़न को बढ़ावा देना होगा. इन टिप्पणियों के साथ हाई कोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए महिला के खिलाफ दर्ज पूरा आपराधिक मामला रद्द कर दिया.