कांग्रेस: बिहार की हार के बाद वेणुगोपाल पर भड़का आंतरिक गुस्सा
नई दिल्ली । विशेष संवाददाता: बिहार विधानसभा चुनावों में करारी हार झेलने के बाद कांग्रेस पार्टी की कोशिशें साफ हैं चुनाव आयोग को 'विलेन' ठहराकर मुंह छिपाने की. लेकिन सतह के नीचे उफान पर है असली आग, संगठन की बर्बादी को लेकर पार्टी के भीतर गुस्सा तेज हो रहा है. सत्ता का केंद्रीकरण करने के आरोपों से हवा गर्म है, और निशाना बना है केरल के सांसद के.सी. वेणुगोपाल, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के करीबी. 2019 में उन्हें ऑल इंडिया कांग्रेस कमिटी (AICC) का महासचिव (संगठन) बनाया गया था, लेकिन तब से राज्य स्तर पर संगठन को संवारने का कोई ठोस नतीजा नजर नहीं आ रहा.
पार्टी के विभिन्न प्रांतीय नेतृत्व का मानना है कि वेणुगोपाल का कार्यकाल राज्य इकाइयों को मजबूत करने के बजाय दूरबीन से तलाशने जैसा हो गया है. AICC के एक वर्ग का आरोप है कि वे जमीनी स्तर से कटे हुए हैं. संगठन को 'कॉर्पोरेट स्टाइल' में चलाने की कोशिश, डेटा एनालिसिस, वॉर रूम रिपोर्ट्स और टेंडरधारक नेताओं पर भरोसा लेकिन नेताओं से मिलना-जुलना तक बंद. इतना ही नहीं, वेणुगोपाल पर यह भी इल्जाम लग रहा है कि वे कांग्रेसी नेताओं-नेताओं से आमने-सामने बातचीत तक नहीं करते.
बताया जाता है कि हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने महाराष्ट्र के एक कांग्रेसी नेता से नाराजगी जाहिर की. उन्होंने कहा, "सोनिया गांधी से मिलना आसान है, लेकिन वेणुगोपाल का समय पाना नामुमकिन." नाम न छापने की शर्त पर AICC के एक वरिष्ठ सदस्य ने तल्ख लहजे में कहा, "वेणुगोपाल का पैमाना सिर्फ राहुल-प्रियंका की नजदीकी है. जमीनी हकीकत, राज्य संगठनों को कैसे मजबूत करें इसकी कोई दवा उनके पास नहीं. फिर भी राहुल उनकी ही सुनते हैं."
राहुल गांधी का वेणुगोपाल पर अटूट भरोसा जगजाहिर है. लोकसभा में विपक्ष के नेता के रूप में राहुल ने उन्हें कोई आधिकारिक पद न देकर भी अपनी सीट के ठीक बगल में जगह दी है. जबकि डिप्टी लीडर गौरव गोगोई को दूर रखा गया. संसदीय दल की बैठकों में यह तस्वीर पार्टी के भीतर खटक पैदा कर रही है. असंतोष बढ़ रहा है, लेकिन सवाल यह है क्या राहुल को इस आग की लपटें महसूस हो रही हैं? AICC के गलियारों में यही बहस छिड़ी है.
बिहार चुनावों की हार ने कांग्रेस को आईना दिखाया है. पार्टी सूत्रों का कहना है कि संगठनात्मक कमजोरी को नजरअंदाज कर चुनाव आयोग पर दोषारोपण से मुद्दा हल नहीं होगा. वेणुगोपाल के नेतृत्व में 'डेटा-ड्रिवन' अप्रोच की आलोचना हो रही है, जो जमीनी कार्यकर्ताओं को अलग-थलग कर रही. अगर समय रहते सुधार न हुए, तो आगामी चुनावों में यह आंतरिक कलह और भारी पड़ सकता है. कांग्रेस के पुनरुद्धार की राह में यह चुनौती कितनी बड़ी, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि शीर्ष नेतृत्व के फैसले पर ही सवाल उठ रहे हैं.