वैश्विक प्रशासन में सुधार के लिए चीन ने पेश किया नया श्वेत पत्र
बीजिंग । डेस्क: वैश्विक व्यवस्था में सुधार और उभरती चुनौतियों से निपटने के लिए चीन सरकार ने एक नया श्वेत पत्र जारी किया है. "अधिक न्यायसंगत और निष्पक्ष वैश्विक शासन: चीन के सिद्धांत, प्रस्ताव और कार्य" शीर्षक वाले इस दस्तावेज़ में वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बदलने और मजबूत करने के लिए बीजिंग की प्राथमिकताओं को रेखांकित किया गया है.
राष्ट्रपति शी जिनपिंग के विचारों से प्रेरित यह श्वेत पत्र एक ऐसे समय में आया है जब दुनिया कई तरह के सुरक्षा और विकास संबंधी संकटों से जूझ रही है. इस दस्तावेज़ के माध्यम से चीन ने वैश्विक स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में सभी देशों की समान भागीदारी की वकालत की है.
पश्चिमी वर्चस्व और वैश्विक कमियों पर प्रहार:
चीन ने अपने इस आधिकारिक दस्तावेज़ में स्थापित पश्चिमी व्यवस्था की सीमाओं को उजागर किया है. श्वेत पत्र के अनुसार, 1990 के दशक में यूरोप से शुरू हुई 'वैश्विक शासन' की अवधारणा पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय कभी भी पूरी तरह सहमत नहीं हो सका. इसका मुख्य कारण पश्चिमी देशों का दबदबा रहा है, जो आज की दुनिया के शांति, विकास, सुरक्षा और आपसी विश्वास के संकट को दूर करने में विफल रहा है.
चीन का मानना है कि महाशक्तियों की वर्चस्ववादी मानसिकता के कारण वैश्विक शासन केवल कुछ देशों द्वारा पूरी दुनिया पर शासन करने तक सीमित होकर रह गया है. इसके परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं की विश्वसनीयता कमजोर हुई है और 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों) को हाशिए पर धकेल दिया गया है.
'ग्लोबल गवर्नेंस इनिशिएटिव' के पांच स्तंभ:
इन कमियों को दूर करने के लिए चीन ने साल 2025 में राष्ट्रपति शी जिनपिंग द्वारा प्रस्तावित 'ग्लोबल गवर्नेंस इनिशिएटिव' को मुख्य समाधान के रूप में पेश किया है. यह पहल पांच बुनियादी सिद्धांतों पर टिकी है, जिनमें संप्रभुता की समानता, अंतरराष्ट्रीय कानून का शासन, बहुपक्षवाद, जन-केंद्रित दृष्टिकोण और परिणाम-उन्मुख कार्रवाई शामिल हैं.
यह नीति पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों के उस पुराने ढर्रे को खारिज करती है जहाँ ताकतवर देश ही नियम तय करते थे. चीन का दावा है कि उसकी यह पहल दुनिया भर में न्याय, सहयोग और खोखली बयानबाजी के बजाय वास्तविक कार्रवाई की मांग को पूरा करती है.
नई व्यवस्था नहीं, मौजूदा व्यवस्था का सुधार:
श्वेत पत्र में इस बात को साफ किया गया है कि चीन किसी नई समानांतर व्यवस्था को शुरू नहीं करना चाहता, बल्कि वह वर्तमान अंतरराष्ट्रीय ढांचे को आज की वास्तविकताओं के अनुरूप ढालना चाहता है. दुनिया के सभी 190 से अधिक देशों की सामाजिक और विकास प्रणालियाँ भले ही अलग हों, लेकिन वे नीति-निर्माण में समान अधिकार चाहते हैं.
चीन के अनुसार, वैश्विक शासन किसी एक समूह का काम नहीं बल्कि सबका साझा व्यवसाय है. यह पहल समावेशी आर्थिक वैश्वीकरण और बहुध्रुवीय व्यवस्था का समर्थन करती है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि विकास का लाभ किसी एक क्षेत्र तक सीमित न रहकर सभी देशों तक पहुंचे.
चीनी पहलों के व्यावहारिक परिणाम:
चीन ने केवल सिद्धांत ही नहीं, बल्कि वैश्विक समस्याओं को सुलझाने के अपने व्यावहारिक अनुभवों को भी दुनिया के सामने रखा है. 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' और 'इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन फॉर मेडिएशन' जैसे अभिनव तंत्रों के माध्यम से चीन ने संघर्षों को सुलझाने और सहयोग बढ़ाने में अपनी भूमिका को रेखांकित किया है.
नए क्षेत्रों में शासन के नियमों को बेहतर बनाने और विकासशील देशों की आवाज बुलंद करने में चीन लगातार सक्रिय रहा है. आंकड़ों के अनुसार, एक साल से भी कम समय में लगभग 160 देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने इस पहल का समर्थन किया है, जबकि 60 से अधिक देश इसके मित्र समूह में शामिल हो चुके हैं.
भविष्य की राह और उत्तर-दक्षिण सहयोग:
बीजिंग ने भविष्य के सुधारों के लिए नौ प्रमुख दिशाएं तय की हैं. इसमें सबसे महत्वपूर्ण मांग संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की है, ताकि विकासशील देशों, विशेष रूप से अफ्रीकी देशों के प्रतिनिधित्व और प्रभाव को बढ़ाया जा सके.
हालांकि, चीन ने स्पष्ट किया है कि वैश्विक शासन में सुधार का मतलब 'ग्लोबल साउथ' और 'ग्लोबल नॉर्थ' (विकसित देशों) के बीच दीवार खड़ी करना नहीं है. सतत विकास के लिए दोनों पक्षों के बीच सहयोग अनिवार्य है.
चीन ने विकसित देशों से अपनी जिम्मेदारियों को निभाने और अधिक संसाधन उपलब्ध कराने की अपील की है, साथ ही विकासशील देशों से भी अपनी क्षमता के अनुसार योगदान देने का आह्वान किया है ताकि मिलकर मानव जाति के साझा भविष्य का निर्माण किया जा सके.