बिलासपुर: बर्ड फ्लू से सरकारी पोल्ट्री फार्म में 4400 मुर्गियों की मौत
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के कोनी क्षेत्र स्थित एक सरकारी पोल्ट्री फॉर्म में बर्ड फ्लू (एवियन इन्फ्लुएंजा) के प्रकोप से हड़कंप मच गया है. आधिकारिक जानकारी के अनुसार, 19 मार्च से 24 मार्च के बीच इस फॉर्म में लगभग 4,400 मुर्गियों की मौत हो गई है.
पशु चिकित्सा विभाग के संयुक्त संचालक डॉ. जी.एस. तंवर ने बताया कि फॉर्म में कुल 5,037 मुर्गियां थीं. भोपाल स्थित प्रयोगशाला ने मृत पक्षियों के नमूनों में बर्ड फ्लू के संक्रमण की पुष्टि कर दी है.
इस गंभीर स्थिति को देखते हुए जिला कलेक्टर संजय अग्रवाल ने 'संशोधित कार्य योजना 2021' के तहत तत्काल रोकथाम और नियंत्रण के निर्देश जारी किए हैं.
प्रशासन ने पोल्ट्री फॉर्म के एक किलोमीटर के दायरे को 'संक्रमित क्षेत्र' और 10 किलोमीटर के दायरे को 'निगरानी क्षेत्र' घोषित कर दिया है.
प्रोटोकॉल के तहत संक्रमित क्षेत्र में मुर्गियों, अंडों और चारे को नष्ट किया जाएगा और उनके परिवहन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया है.
प्रभावित पशुपालकों को विभाग द्वारा मुआवजा दिया जाएगा. मुर्गियों को मारने, सुरक्षित निपटान और सैनिटाइजेशन के लिए 'रैपिड रिस्पांस टीमें' तैनात कर दी गई हैं.
राहत की बात यह है कि अब तक इंसानों में संक्रमण का कोई मामला सामने नहीं आया है, फिर भी फॉर्म कर्मियों के स्वास्थ्य की निरंतर निगरानी की जा रही है. अधिकारियों ने जनता से अफवाहों पर ध्यान न देने और सतर्क रहने की अपील की है.
गौरतलब है कि बर्ड फ्लू, जिसे वैज्ञानिक भाषा में 'एवियन इन्फ्लुएंजा' कहा जाता है, मुख्य रूप से इन्फ्लुएंजा टाइप 'ए' वायरस के कारण होने वाला एक अत्यधिक संक्रामक वायरल संक्रमण है.
यह वायरस प्राकृतिक रूप से जंगली जलपक्षियों (जैसे बत्तख और हंस) में पाया जाता है, जो खुद बीमार हुए बिना इसे लंबी दूरी तक फैला सकते हैं, लेकिन जब यह वायरस पालतू मुर्गियों, टर्की या बत्तखों में पहुंचता है, तो यह उनके लिए जानलेवा साबित होता है.
पक्षियों के बीच यह संक्रमण उनके लार, नाक के स्राव और बीट (मल) के सीधे संपर्क में आने से फैलता है; यहाँ तक कि दूषित दाना, पानी या संक्रमित फार्म पर इस्तेमाल किए गए उपकरण और जूते-कपड़े भी इस वायरस को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने का जरिया बनते हैं.
जहाँ तक इंसानों को खतरे की बात है, तो आमतौर पर बर्ड फ्लू का वायरस इंसानों को आसानी से संक्रमित नहीं करता है, लेकिन यह पूरी तरह से जोखिम मुक्त भी नहीं है. यदि कोई व्यक्ति संक्रमित पक्षियों, उनके मल या उनके स्राव के सीधे और निकट संपर्क में आता है, तो वायरस आंखों, नाक या मुंह के जरिए मानव शरीर में प्रवेश कर सकता है.
हालांकि इंसानों में इसके मामले कम देखे गए हैं, लेकिन जब संक्रमण होता है, तो यह बेहद गंभीर और घातक हो सकता है, जिससे श्वसन संबंधी गंभीर समस्याएं या निमोनिया जैसी स्थिति पैदा हो सकती है.
विशेषज्ञों का मानना है कि सबसे बड़ा खतरा वायरस के 'म्यूटेशन' (स्वरूप बदलने) से है. यदि यह वायरस खुद को इस तरह बदल ले कि यह आसानी से एक इंसान से दूसरे इंसान में फैलने लगे, तो यह वैश्विक महामारी का रूप ले सकता है.
फिलहाल, बचाव के लिए पक्षियों के सीधे संपर्क से बचने, मांस और अंडों को पूरी तरह पकाकर (कम से कम 70°C पर) खाने और साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखने की सलाह दी जाती है.