कैंसर की दवाओं की लागत बढ़ने से उत्पादन ठप होने की कगार पर
नई दिल्ली । डेस्क: देश में कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली सबसे महत्वपूर्ण और जीवन रक्षक दवाओं की उपलब्धता पर एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है. कैंसर के इलाज का आधार मानी जाने वाली 'प्लेटिन' श्रेणी की दवाओं, जिनमें सिस्प्लैटिन, कार्बोप्लेटिन और ऑक्सालिप्लेटिन शामिल हैं, का उत्पादन अब दवा कंपनियों के लिए आर्थिक रूप से असंभव होता जा रहा है. इसका मुख्य कारण इन दवाओं को बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल यानी प्लैटिनम की कीमतों में आया वैश्विक उछाल है.
आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ महीनों में प्लैटिनम की कीमतें भारतीय बाजार में दोगुनी से भी ज्यादा हो गई हैं. सितंबर 2025 में जो प्लैटिनम 3,869 रुपये प्रति ग्राम पर उपलब्ध था, उसकी कीमत फरवरी 2026 तक 8,000 रुपये प्रति ग्राम तक पहुँच गई है. वैश्विक स्तर पर भी 2026 की पहली तिमाही में इसकी कीमतों में 30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है.
दवा उद्योग के विशेषज्ञों और प्रमुख कंपनियों जैसे सिपला, डॉ. रेड्डीज, ज़ायडस लाइफसाइंसेज और हेटेरो ने राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) से इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप करने की मांग की है. कंपनियों का तर्क है कि जहां एक ओर दवाओं के निर्माण की लागत (API कॉस्ट) में 200 से 300 प्रतिशत तक की भारी वृद्धि हुई है, वहीं दूसरी ओर सरकार द्वारा इन दवाओं के लिए तय की गई अधिकतम बिक्री कीमत (सीलिंग प्राइस) साल 2013 और 2015 के बाद से लगभग स्थिर बनी हुई है.
उदाहरण के तौर पर, कार्बोप्लेटिन की कीमत में 2015 के बाद से केवल 2.21 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि हुई है, जो मौजूदा महंगाई दर के मुकाबले नगण्य है. मौजूदा नियमों के तहत कार्बोप्लेटिन के एक वायल की कीमत लगभग 61 रुपये पर सीमित है, जबकि इसके निर्माण की लागत अब इससे कहीं ज्यादा हो चुकी है.
इस भारी घाटे से बचने के लिए कई निर्माताओं को उत्पादन रोकने पर मजबूर होना पड़ा है, जिससे बाजार में इन दवाओं की भारी कमी होने का खतरा पैदा हो गया है.
कैंसर विशेषज्ञों का मानना है कि इन दवाओं की कमी का सीधा असर मरीजों की जान पर पड़ सकता है क्योंकि कीमोथेरेपी के अधिकांश प्रोटोकॉल में ये दवाएं अनिवार्य होती हैं. सिर, गर्दन, फेफड़े, स्तन और पेट के कैंसर जैसे आम कैंसर के इलाज में इन दवाओं का कोई सस्ता विकल्प मौजूद नहीं है. यदि सरकार इन दवाओं की कीमतों में कम से कम 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी की अनुमति नहीं देती है, तो न केवल निजी अस्पतालों में इलाज महंगा हो जाएगा, बल्कि आयुष्मान भारत जैसी सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों को भी दवाएं मिलने में कठिनाई होगी.
जानकारों के अनुसार, दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में खनन की समस्याओं और बिजली संकट के कारण प्लैटिनम की वैश्विक कमी बनी हुई है, जिससे आने वाले समय में कीमतें और बढ़ सकती हैं. ऐसे में 'मेक इन इंडिया' मिशन के तहत कैंसर दवाओं के क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता को बनाए रखने के लिए सरकार का हस्तक्षेप अब अनिवार्य हो गया है. File Photo