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चिंपांजियों में पहली बार देखा गया खूनी 'गृहयुद्ध': अपनों के ही दुश्मन बने युगांडा के वनमानुष

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14 अप्रै. 2026, 02:07 AM 3 मिनट में पढ़ें 1

युगांडा के चिम्पांजी
युगांडा के चिम्पांजी

नई दिल्ली । डेस्क: युगांडा के किबाले नेशनल पार्क में वैज्ञानिकों ने एक ऐसी घटना को अपनी आंखों से देखा है जिसने मानव व्यवहार और पशु जगत के बीच की सीमाओं को धुंधला कर दिया है. 'साइंस' पत्रिका में प्रकाशित एक ताजा अध्ययन के अनुसार, दुनिया के सबसे बड़े चिंपांजी समूह 'नोगोगो' के बीच एक भीषण और वर्षों तक चलने वाला 'गृहयुद्ध' दर्ज किया गया है. यह पहली बार है जब वैज्ञानिकों ने किसी एक ही समूह के चिंपांजियों को दो फाड़ होते और फिर एक-दूसरे के खून का प्यासा बनते देखा है. 


प्राइमेटोलॉजिस्ट आरोन सैंडल ने इस खूनी संघर्ष की शुरुआत को जून 2015 के एक दिन महसूस किया था, जब चिंपांजियों का व्यवहार अपने ही समूह के सदस्यों के प्रति असामान्य रूप से डरा हुआ और संदिग्ध था. वे एक-दूसरे को सांत्वना दे रहे थे, जैसे कि वे अपने साथियों से नहीं बल्कि किसी दुश्मन से मिलने जा रहे हों.

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शोधकर्ताओं ने लगभग तीन दशकों के आंकड़ों का विश्लेषण कर बताया कि 1995 से 2015 तक एकजुट रहा यह समूह 2018 तक दो गुटों में बंट गया पश्चिमी चिंपांजी और मध्य चिंपांजी. यह विभाजन केवल सामाजिक अलगाव तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने एक हिंसक मोड़ ले लिया. अगले सात वर्षों में, पश्चिमी समूह ने मध्य समूह पर 24 बार संगठित हमले किए, जिसमें कम से कम 7 वयस्क नर और 17 शिशुओं की जान ले ली गई. 


वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तरह की हिंसा आमतौर पर बाहरी समूहों के खिलाफ देखी जाती है, लेकिन अपनों के बीच ऐसा खूनी संघर्ष 'मानवीय स्थिति' (Human Condition) के बेहद करीब है. यह हमें सोचने पर मजबूर करता है कि कैसे गहरे सहयोग वाले समूह अचानक एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन बन जाते हैं.


इस विभाजन के पीछे के कारणों ने विशेषज्ञों को चौंका दिया है. शोधकर्ताओं के अनुसार, समूह के भीतर सामाजिक पदानुक्रम (Social Hierarchy) का टूटना इसका मुख्य कारण था. साल 2015 में जब समूह के अल्फा नर ने दूसरे चिंपांजी के सामने आत्मसमर्पण किया, तो वहां से सत्ता का संतुलन बिगड़ने लगा. इसके साथ ही, समूह के कई पुराने और प्रभावशाली चिंपांजियों की मृत्यु ने आपसी संबंधों की कड़ी को कमजोर कर दिया था. 


2017 में फैली एक बीमारी ने इस दरार को और गहरा कर दिया, जिससे विभाजन अनिवार्य हो गया. विशेषज्ञों का मानना है कि जब समूह को जोड़ने वाले 'की-इंडिविजुअल्स' या महत्वपूर्ण सदस्य नहीं रहते, तो ध्रुवीकरण का खतरा बढ़ जाता है.


यह अध्ययन केवल पशु व्यवहार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वन्यजीव संरक्षण के लिए एक चेतावनी भी है. आनुवंशिक साक्ष्यों के आधार पर वैज्ञानिकों का कहना है कि चिंपांजियों में इस तरह के गृहयुद्ध हर 500 साल में एक बार होते हैं. 


हालांकि, इंसानी दखल जैसे कि वनों की कटाई, जलवायु संकट और नई बीमारियों के फैलने से चिंपांजियों की सामाजिक एकता भंग हो रही है. यदि उनकी सामाजिक संरचना इसी तरह टूटती रही, तो उनके बीच आपसी युद्ध और अधिक सामान्य हो सकते हैं, जो पहले से ही विलुप्ति की कगार पर खड़ी इस प्रजाति के लिए घातक साबित होगा. 


डार्विन के सिद्धांत के नजरिए से देखें तो, पश्चिमी चिंपांजियों ने अपने प्रतिस्पर्धियों को खत्म कर अपनी उत्तरजीविता बढ़ाने की कोशिश की है, जिसके परिणामस्वरूप मध्य समूह के जीवित रहने की दर अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है. यह घटना साबित करती है कि बिना किसी सांस्कृतिक पहचान के भी, सामाजिक बंधन ही समूहों को जोड़कर रखते हैं, और उनके टूटने का परिणाम अत्यंत विनाशकारी होता है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP