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बस्तर: यहां देवी-देवताओं के लिए जलाई जाती है होली

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03 मार्च 2026, 08:23 AM 2 मिनट में पढ़ें 4

बस्तर होली
बस्तर होली

जगदलपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ के बस्तर में होली का पर्व अपनी अनूठी परंपराओं के लिए देशभर में विख्यात है. जहां पूरे देश में होलिका दहन का संबंध भक्त प्रह्लाद और होलिका की पौराणिक कथा से जोड़ा जाता है, वहीं बस्तर की रियासतकालीन होली का इतिहास स्थानीय देवी-देवताओं और राजसी परंपराओं से जुड़ा है. 


पिछले 600 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में दंतेवाड़ा की फागुन मंडई, माड़पाल गांव की होली और जगदलपुर का 'जोड़ा होलिका दहन' आज भी श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है. यहां भक्त प्रह्लाद के स्थान पर भगवान विष्णु के अवतार कल्कि, माता दंतेश्वरी और मावली माता की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है.

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इतिहास के झरोखों से देखें तो इस परंपरा की नींव साल 1408 ईस्वी में महाराजा पुरुषोत्तम देव ने रखी थी. जगन्नाथ पुरी से 'रथपति' की उपाधि लेकर लौटते समय महाराजा ने होली की रात माड़पाल गांव में विश्राम किया और वहीं होलिका दहन किया. 


तब से आज तक यह रिवाज कायम है, जिसमें बस्तर राजपरिवार के सदस्य और वर्तमान राजकुमार कमलचंद भंजदेव खुद शामिल होकर दहन की रस्म पूरी करते हैं. 


बस्तर में होली जलाने का एक खास क्रम निर्धारित है. सबसे पहले दंतेवाड़ा में, फिर माड़पाल गांव में और अंत में जगदलपुर के सीरासार चौक पर 'जोड़ा होली' जलाई जाती है. 


यह जोड़ा होली मावली माता और भगवान जगन्नाथ को समर्पित होती है, जिसकी अग्नि माड़पाल से लाई जाती है. इसी प्राचीन रीति के अनुसार सोमवार रात भी हजारों लोगों की उपस्थिति में विधि-विधान से होलिका दहन संपन्न हुआ, जिसके बाद ही पूरे संभाग में अन्य स्थानों पर होली जलाने की अनुमति मिली.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP