अरावली मामला: सुप्रीम कोर्ट ने विशेषज्ञ रिपोर्ट पर लगाई रोक, नई कमेटी बनेगी
नई दिल्ली । डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों की परिभाषा और खनन गतिविधियों से जुड़ी अपनी पिछली रिपोर्ट और निर्देशों के कार्यान्वयन पर रोक लगा दी है. सोमवार, 29 दिसंबर 2025 को न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ए.जी. मसीह की पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी भी निर्देश को लागू करने से पहले एक निष्पक्ष और स्वतंत्र विशेषज्ञ राय प्राप्त करना अनिवार्य है.
न्यायालय ने चिंता व्यक्त की कि यदि अरावली की परिभाषा केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचे भू-भागों तक सीमित रखी गई, तो इसका गलत अर्थ निकाला जा सकता है, जिससे पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में अनियमित खनन को बढ़ावा मिल सकता है.
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलीलों पर विचार करते हुए, पीठ ने अब अरावली रेंज की सटीक परिभाषा की जांच के लिए एक 'हाई-पावर्ड एक्सपर्ट कमेटी' गठित करने का प्रस्ताव दिया है.
अदालत ने अटार्नी जनरल और वरिष्ठ अधिवक्ता पी. परमेश्वर से इस समिति के गठन में सहायता मांगी है.
जब तक नई समिति अपनी रिपोर्ट नहीं सौंप देती, तब तक नवंबर में दिए गए पुराने निर्देश और विशेषज्ञ रिपोर्ट स्थगित रहेंगे. मामले की अगली सुनवाई 21 जनवरी को होगी.
अरावली पर्वत श्रृंखला मामला
गौरतलब है कि अरावली पर्वतमाला देश की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है और यह पश्चिमी भारत में मरुस्थलीकरण रोकने, भूजल स्तर बनाए रखने तथा पारिस्थितिक संतुलन के लिए बेहद अहम भूमिका निभाती है. दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों में अरावली की भौगोलिक स्थिति और उसकी परिभाषा को लेकर लंबे समय से मतभेद रहे हैं. इन्हीं विरोधाभासी परिभाषाओं के कारण नियामक खामियां पैदा हुईं और कई जगहों पर अवैध खनन को बढ़ावा मिला.
बता दें कि इन्हीं समस्याओं के समाधान के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पहले एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया था. नवंबर में दिए गए एक फैसले में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई की अगुवाई वाली पीठ जिसमें न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया भी शामिल थे ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) की समिति द्वारा सुझाई गई ‘ऑपरेशनल परिभाषा’ को खनन के संदर्भ में स्वीकार किया था.
उस परिभाषा के अनुसार, “अरावली हिल्स” ऐसे किसी भी भू-आकृतिक क्षेत्र को कहा गया है जो चिन्हित जिलों में स्थानीय भू-स्तर से कम से कम 100 मीटर ऊंचा हो, जिसमें उससे जुड़े ढलान और संबद्ध भू-आकृतियां भी शामिल हों. वहीं, यदि ऐसी दो या अधिक पहाड़ियां आपस में 500 मीटर की दूरी के भीतर हों, तो उन्हें मिलकर “अरावली रेंज” माना जाएगा.
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट निर्देश दिया था कि अरावली जैसे संवेदनशील क्षेत्र में किसी भी नए खनन कार्य की अनुमति देने से पहले केंद्र सरकार को “सस्टेनेबल माइनिंग के लिए व्यापक प्रबंधन योजना” (Management Plan for Sustainable Mining – MPSM) तैयार करनी होगी.
अब, नई परिभाषा को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच सुप्रीम कोर्ट का स्वतः संज्ञान लेना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि अदालत पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन को लेकर एक बार फिर सख्त रुख अपना सकती है. 29 दिसंबर की सुनवाई पर पर्यावरणविदों, राज्यों और खनन क्षेत्र की निगाहें टिकी हुई थी जो आज आ गया है.