ईरान के भीतर से उठी शांति की आवाज, पूर्व विदेश मंत्री का शांति का रोडमैप
नई दिल्ली । डेस्क: मध्य पूर्व में जारी विनाशकारी युद्ध और बढ़ते सैन्य तनाव के बीच ईरान के भीतर से सुलह और शांति की एक अत्यंत महत्वपूर्ण आवाज गूंजी है. ईरान के पूर्व विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद ज़रीफ़ ने 'फॉरेन अफेयर्स' पत्रिका में एक विस्तृत रोडमैप प्रकाशित कर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है, जिसमें उन्होंने अमेरिका और इजरायल के साथ चल रहे मौजूदा संघर्ष को समाप्त करने के लिए एक व्यावहारिक कूटनीतिक रास्ता सुझाया है.
ज़रीफ़ का यह प्रस्ताव ऐसे समय में सामने आया है जब क्षेत्र में शत्रुता अपने चरम पर है और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को समझौते के लिए महज 48 घंटे की सख्त समय सीमा दी है.
यह लेख स्पष्ट करता है कि ईरान के भीतर एक ऐसा धड़ा मौजूद है जो युद्ध की विभीषिका को समझता है और सैन्य जीत के दावों से ऊपर उठकर नागरिक जीवन और बुनियादी ढांचे की रक्षा को प्राथमिकता देना चाहता है.
ज़रीफ़ ने स्वीकार किया है कि भले ही ईरान युद्ध में अपनी बढ़त का दावा करे, लेकिन संघर्ष को लंबा खींचना केवल विनाश की ओर ले जाएगा, जिसे उन्होंने "मनोवैज्ञानिक रूप से संतोषजनक" तो बताया पर रणनीतिक रूप से आत्मघाती माना है.
ज़रीफ़ द्वारा पेश किया गया शांति का यह रोडमैप केवल एक अस्थायी युद्धविराम नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता का एक स्थायी ढांचा है. उन्होंने प्रस्ताव दिया है कि ईरान को अंतरराष्ट्रीय निगरानी के तहत अपने परमाणु कार्यक्रम पर कड़े प्रतिबंधों को स्वीकार कर लेना चाहिए. इसके बदले में, अमेरिका को ईरान पर लगे सभी आर्थिक प्रतिबंधों और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों को पूरी तरह समाप्त करना होगा.
इस कूटनीतिक सौदे के तहत ईरान अपने यूरेनियम संवर्धन के स्तर को 3.67 प्रतिशत से नीचे लाने और कभी भी परमाणु हथियार न बनाने की आधिकारिक प्रतिबद्धता जताएगा. वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की रिपोर्टें बताती हैं कि ईरान के पास 60 प्रतिशत तक संवर्धित यूरेनियम का भंडार है, जिसे सैन्य ग्रेड तक पहुंचाना बहुत आसान है.
ज़रीफ़ ने राष्ट्रपति ट्रंप की 'शून्य संवर्धन' की मांग को अव्यावहारिक बताते हुए एक मध्य मार्ग का सुझाव दिया है, जिसमें दोनों देश एक-दूसरे पर हमला न करने का 'अनाक्रमण समझौता' करें, जिससे भविष्य की सुरक्षा चिंताओं का स्थायी समाधान हो सके.
इस शांति पहल का एक अन्य प्रमुख स्तंभ आर्थिक और क्षेत्रीय सहयोग है. ज़रीफ़ ने सुझाव दिया कि होर्मुज जलडमरूमध्य, जो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का एक-पांचवां हिस्सा नियंत्रित करता है, उसे ईरान को तुरंत व्यापार के लिए खोल देना चाहिए.
उन्होंने एक अभिनव विचार पेश करते हुए कहा कि चीन, रूस और अमेरिका की भागीदारी के साथ एक क्षेत्रीय ईंधन-संवर्धन कंसोर्टियम बनाया जाना चाहिए, जिसमें ईरान और उसके खाड़ी पड़ोसी मिलकर काम करें.
इससे न केवल परमाणु चिंताओं का समाधान होगा, बल्कि क्षेत्र में आर्थिक निर्भरता भी बढ़ेगी. इसके अलावा, उन्होंने मिस्र, पाकिस्तान और तुर्की जैसे देशों को शामिल कर एक 'क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे' के गठन का प्रस्ताव दिया है, जो समुद्र में आवाजाही की स्वतंत्रता और आपसी सहयोग की गारंटी दे सके. ज़रीफ़ ने तर्क दिया है कि यह योजना राष्ट्रपति ट्रंप के लिए एक बेहतरीन "ऑफ-रैंप" साबित हो सकती है, जिससे वे सम्मानजनक तरीके से युद्ध समाप्त कर शांति की जीत का दावा कर सकते हैं.
हालांकि, ईरान के भीतर से उठी इस शांति की अपील को पड़ोसी खाड़ी देशों ने संदेह और आलोचना की दृष्टि से भी देखा है. संयुक्त अरब अमीरात और कतर के नेतृत्व ने ज़रीफ़ के प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि यह रोडमैप उन घावों को नजरअंदाज करता है जो ईरान के ड्रोन और मिसाइल हमलों ने पड़ोसी देशों को दिए हैं.
यूएई के राजनयिक सलाहकार अनवर गरगाश ने इसे ईरान की रणनीतिक विफलता बताया है, जबकि कतर के पूर्व प्रधानमंत्री ने माना कि हालांकि ज़रीफ़ का दृष्टिकोण चतुर है, लेकिन युद्ध के कारण ईरान ने अपने क्षेत्रीय मित्रों का भरोसा खो दिया है.
इन आलोचनाओं के बावजूद, ज़रीफ़ का यह रोडमैप इस समय कूटनीतिक पटल पर सबसे ठोस दस्तावेज बनकर उभरा है. ऐसे माहौल में जहाँ पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र जैसे देश मध्यस्थता की असफल कोशिशें कर रहे हैं, ईरान के एक पूर्व कद्दावर मंत्री द्वारा शांति की बात करना यह दर्शाता है कि तेहरान के भीतर भी युद्ध की थकावट महसूस की जा रही है और वहाँ का एक वर्ग अब बंदूकों के बजाय बातचीत की मेज पर समाधान चाहता है.
यह शांति प्रस्ताव इतिहास के पन्नों में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है, यदि इसे सही कूटनीतिक इच्छाशक्ति के साथ अपनाया जाए.