आदिवासी अनाथ नहीं, मालिक होने का जय घोष है
कनक तिवारी
इक्कीसवीं सदी के संवैधानिक गणराज्य में आदिवासियों को अजायबघर की दर्शनीय वस्तु बनाकर नहीं रखा जा सकता-ऐसा विकास समर्थकों का तर्क है. शिक्षा, स्वास्थ्य, नियोजन, यातायात, संचार, अनाज, पानी और पर्यावरण आदिवासी जीवन की बुनियादी आवश्यकताएं हैं. लोकतांत्रिक सरकारें ये बुनियादी सुविधाएं जुटाने में फिसड्डी रही हैं. अब निर्लज्ज क्रूरता पर उतारू हैं.
नेहरू-युग का राष्ट्रीय नेतृत्व बुनियादी तौर पर ऊंचे कद का था. भले ही उसमें धीरे धीरे वंशजों के दीमक उगते रहे. नरसिंह राव की हुकूमत से भारत में आर्थिक, राजनीतिक, चारित्रिक पतन का दौर शुरू हुआ. देश की गाड़ी अब ढाल पर है. आदिवासी इलाकों में कुछ वैश्य कुनबों ने जंगलों, खदानों, लोककर्म, सिंचाई, आबकारी वगैरह विभागों के ठेके हथिया लिए हैं . उन्होंने कुछ पढ़े लिखे प्रतिनिधिक आदिवासी नेतृत्व को बरगला कर उसे अवांछित सुविधाओं का पराश्रयी बना दिया. इसी वर्ग को बाद में ‘मलाईदार तबका‘ कहा गया.
आदिवासियों की आर्थिक-सांस्कृतिक समृद्धि के लोककलात्मक जीवन को यदि उसकी मूल लय में ही आत्मसात नहीं किया जाता तो सरकारों और उग्र आंदोलनों का एक जैसा हश्र होगा. आदिवासी डायनोसाॅर के युग के नहीं हैं जिनके अवशेषों का कोई पुरातात्विक महत्व है. वे एक जिन्दा मानव कौम हैं. उनकी आर्थिक बदहाली, अशिक्षा, कुपोषण, राजनीतिक पराभव, सामाजिक दबाव, पलायन आदि राक्षस हैं. उनकी गरिमामय इंसानी जीवन शैली में ज़हर घोल रहे हैं.
उद्योगपतियों के विकसित होने से उनका कोई लेना देना नहीं है. वे जानते हैं कि उनकी ज़मीनें नहीं छिननी चाहिए. उन्नीसवीं सदी के बिल में अंगरेजी कानूनी सांप पैदा हुए थे. वे इक्कीसवीं सदी में भी फुफकार और डस रहे.
यह कैसा विकास है जो आधा एकड़, आधा बीघा तक के आदिवासी भूमिधारकों को जबरिया बेदखल करके उनकी छाती पर अनाज के बदले इस्पात या बिजली उगना चाहे. वह जंगलों का सर्वनाश करे. नदियों का पानी सोख ले. हवा में ज़हरीला धुंआ घोल दे. पशुओं को मार डाले. पक्षियों को देश निकाला दे दे. जंगल के संगीत के बदले कारखानों के शोर का डी.जे. उगा दे. आदिवासी बेटियों को कामुकता के अड्डे की साकी समझे. नौजवान बेटों को शहरों में बहिष्कृत कर दे. पूरे क्षेत्र को भारत के भूगोल में छद्म रूप से जीवित रखते हुए उसे इतिहास का अनाथालय बना दे.
विकास की औद्योगिक परिभाषा के जरिए आदिवासी इलाकों को समुन्नत बनाने के दावे किए जा रहे हैं. आदिवासी इलाकों में बड़े कारखाने लगा ही दिए जाएं तो कैसा,किसका और कितना विकास होगा? एवज में कितने जंगल कटेंगे?
जनता के अधिकार की कीमत पर कारखानों को प्राथमिकता के आधार पर जल का उपयोग करने छूट दी जाएगी. आदिवासी अपनी संस्कृति, कृषि, धरती, परिवेश, परिवार और पूरी प्रकृति से बेदखल होकर शहरी इलाकों की ओर धकियाए जाएंगे. वहां शोषक वर्ग के लोग सभ्यता की आड़ में बंधुआ मजदूरों की तरह काम लेने के लिए पहले से तैयार बैठे हैं. जंगल अभी चोरी से काटे जा रहे हैं. उन्हें शासकीय कानूनों के संरक्षण में डकैती के तेवर में काटा जाएगा. जलवायु और ऋतु परिवर्तन होगा. सूखा पड़ता रहेगा. वनोत्पाद मुश्किल से मिलेंगे. सड़कों और संचार साधनों का रुख शहरों से गांवों की ओर शोषण के लिए होगा. शोषित गांवों से शहरों की ओर भागेंगे.
कोई सरकार श्वेत पत्र प्रकाशित नहीं करती कि खनन के कितने आदेश या लाइसेंस दे दिए गए हैं और दिए जाने वाले हैं. उत्खनित लौह अयस्क का अब तक का क्या लेखा जोखा है. आदिवासी के पास गांव, घर, परिवार, जंगल, पशु पक्षी कुछ नहीं बच रहा है. उसका जीवन संगीत कैसे उसके पास रह पाएगा. जिन हाथों में वाद्य यंत्र सींगबाजा या तुरही वगैरह थे उनमें नक्सलवादियों और सरकार ने बंदूकें थमा दीं हैं. जो प्रकृति में निर्भय होकर आखेट करते थे. वे वनैले पशुओं की तरह दौड़ाए जा रहे हैं. जो आदिवासी वन की शांति में आदिम जीवन संगीत गाते थे. ‘इन्कलाब जिंदाबाद‘ और ‘लाल सलाम‘ के अशांतिमूलक नारे लगा रहे हैं.
एक प्रागैतिहासिक संस्कृति के क्षरण के लिए जो समय है, उसमें हम जी रहे हैं. यही चलता रहा तो बस्तर की राजधानी का नाम न्यू टाटानगर, दंतेवाड़ा के बदले एस्सार पुरी, बीजापुर की जगह मित्तल नगर और नारायणपुर के बदले अम्बानी निलयम जैसे नए नगर उग आएंगे. इन शहरों में संग्रहालय बनेंगे. वहां वन भैंसा, शेर, भालू, चीतल, बंदर और खरगोश अपनी देह में मसाला भरकर पथरा गई आंखों से भविष्य को देखते दिखाए जाएंगे. वे अपने हमसफर कुछ आदिवासी स्त्रियों और पुरुषों की ओर भी देख रहे होंगे. खामोशी में कह रहे होंगे ये जो दर्शक हैं, इनके सभ्य पूर्वजों ने हमें इतिहास के तमाशबीनों के रूप में अमर कर दिया है.
आदिवासी उन दुश्मनों से तो लड़ सकते हैं जो उनके शरीरों पर हमला करें. उनसे नहीं लड़ पाते जो कुटिलता से सभ्यता के हथियार लेकर उन ‘असभ्यों‘ को जबरिया सभ्य बनाने पर तुले हुए हैं. पूरी दुनिया के आदिवासियों को जड़ से नेस्तनाबूद करने के हथियारों का नाम ही तो ‘सभ्यता‘ और ‘विकास‘ के अलावा क्या है.
विकास की अवधारणा गढ़ने का अधिकार संविधान से कार्यपालिका अर्थात मंत्रिपरिषद ने ले लिया है. न्यायपालिका ने तय किया है कि कार्यपालिका के विचारण क्षेत्र में पुनरीक्षण का हस्तक्षेप नहीं करेगी. इसलिए कार्यपालिका विकास की ऊलजलूल अवधारणा भी गढ़ ले, तो चुनौतीहीन हो जाती है.
कार्यपालिका को सातवीं अनुसूची के तहत कानूनों और नियमों को गढ़ने का अधिकार है. न्यायपालिका को उनकी वैधता को जांचने का अधिकार है. कानूनों की उपादेयता, स्वीकार्यता, प्रासंगिकता और भविष्यमूलकता के सवाल लेकिन जनचौपाल के हैं. इन पर बहस मुबाहिसा करने से संविधान भी नहीं रोकता. वह अनुच्छेद 19 में अभिव्यक्ति की आजादी का आसमान मुहैया कराता है.
आदिवासियों के सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक जीवन को नष्ट करने के निर्णयों की कुटिलता में उनके समग्र विकास की अवधारणाओं की वीभत्स छबियां मोहक रूप में दिखाई जाती हैं. सरकार अकेले कैसे तय करेगी कि वह वन, पहाड़ी या नदी जैसी संपदा को किसी उद्योगपति को बेच दे. दलितों, आदिवासियों की बस्तियों, गांवों को खाली करा दे. फिर उसका ‘देश का विकास‘ जैसा नामकरण कर दे.
सरकारों का क्षितिज यदि इतना विशाल हो तो वह लोकतंत्र के परे होगा. देश अंबानियों, टाटाओं, बिड़लाओं, अनिल अग्रवालों, मित्तलों, अदानियों, रुइयाओं और जिंदलों का हो, न हो. यह गरीबों, मुफलिसों, भिखारियों, अनाथों, अपाहिजों और गुमशुदाओं का ज्यादा है.