नेपाल: ओली के इस्तीफे के बाद सैन्य नियंत्रण, क्या है विदेशी साजिश?
काठमांडू । डेस्क: हिमालय की गोद में बसा नेपाल इन दिनों अभूतपूर्व राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल से जूझ रहा है. जन-आंदोलन की आग ने प्रधानमंत्री खड़गप्रसाद (केपी) शर्मा ओली को सत्ता से बेदखल कर दिया. 9 सितंबर, 2025 को ओली ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया, जिसके बाद सेना ने देश की कमान संभाल ली है. राजधानी काठमांडू सहित देश के कोने-कोने में सैन्य टुकड़ियां तैनात हैं, और कर्फ्यू के बीच हिंसक प्रदर्शन जारी हैं. इस अशांति के पीछे क्या केवल आंतरिक असंतोष है, या इसमें विदेशी ताकतों की साजिश भी शामिल है? यह सवाल विश्लेषकों और आम लोगों के बीच चर्चा का केंद्र बना हुआ है.
जन-आंदोलन की चिंगारी और Gen-Z का गुस्सा
नेपाल में यह आंदोलन शुरूआत में सोशल मीडिया पर प्रतिबंध के खिलाफ युवा वर्ग (Gen-Z) के विरोध से शुरू हुआ था. लेकिन जल्द ही यह भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, स्वजपोक्षण, और सांप्रदायिक तनाव के खिलाफ एक बड़े गण-अभ्युत्थान में बदल गया. प्रदर्शनकारियों ने संसद भवन, सरकारी कार्यालयों, और नेताओं के घरों पर हमले किए, जिसमें आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आईं. इस हिंसा में कम से कम 20 लोगों की मौत हो चुकी है, और सैकड़ों घायल हुए हैं. काठमांडू के मेयर बालेंद्र शाह को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाने की मांग जोर पकड़ रही है, क्योंकि युवा उन्हें एक ईमानदार और जमीनी नेता के रूप में देखते हैं.
विदेशी साजिश का साया: चीन और अमेरिका की भूमिका?
नेपाल की इस अशांति को कई विश्लेषक विदेशी ताकतों, खासकर चीन और अमेरिका की खुफिया एजेंसियों, से जोड़कर देख रहे हैं. ओली की सरकार को ‘चीन-समर्थक’ माना जाता था, खासकर उनके द्वारा चीन के ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (बीआरआई) में शामिल होने के बाद. इस प्रोजेक्ट ने नेपाल की अर्थव्यवस्था में चीन का प्रभाव बढ़ाया, जिससे भारत और अमेरिका असहज थे. दूसरी ओर, अमेरिका ने ‘मिलेनियम चैलेंज कॉरपोरेशन’ (एमसीसी) के तहत नेपाल में 50 करोड़ डॉलर का निवेश किया, जिसका उद्देश्य बुनियादी ढांचे का विकास था. विश्लेषकों का मानना है कि इस निवेश के जरिए अमेरिका नेपाल को चीन के प्रभाव से बाहर निकालना चाहता था.
हाल ही में, ओली ने शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में हिस्सा लिया और भारत के साथ सीमा विवाद, खासकर उत्तराखंड के लिपुलेख, कालापानी, और लिंपियाधुरा को लेकर चीन के सामने अपनी बात रखी. नेपाल ने इन क्षेत्रों को अपना हिस्सा बताते हुए भारत के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया था, जिससे नई दिल्ली और बीजिंग, दोनों के साथ उसके रिश्ते तनावपूर्ण हो गए. कुछ विशेषज्ञों का दावा है कि अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए और चीन की ‘मिनिस्ट्री ऑफ स्टेट सिक्योरिटी’ (एमएसएस) इस अशांति में शामिल हो सकती हैं. हालांकि, कुछ कूटनीतिज्ञ इसे ‘अतिसरलीकरण’ मानते हैं और कहते हैं कि यह आंदोलन जनता का स्वतःस्फूर्त गुस्सा है.
आर्थिक संकट और भ्रष्टाचार का बोझ
नेपाल की अर्थव्यवस्था लंबे समय से अस्थिरता का शिकार रही है. पिछले 17 वर्षों में 13 बार सरकार बदलने से कोई ठोस नीति लागू नहीं हो सकी. पर्यटन, जो नेपाल की अर्थव्यवस्था का आधार है, बुरी तरह प्रभावित हुआ है. ओली सरकार पर बेरोजगारी और भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने में विफलता का आरोप है. सोशल मीडिया ने मंत्रियों और उच्च अधिकारियों के परिवारों द्वारा स्वजपोक्षण और विदेशों में संपत्ति अर्जन के खुलासे को उजागर किया. ‘नेपो-बेबी’ (स्वजपोक्षण से लाभान्वित होने वाले लोग) शब्द नेपाल में खासा चर्चित हुआ, जिसने युवाओं के गुस्से को और भड़काया.
सांप्रदायिक तनाव और राजतंत्र की मांग
नेपाल, जो पहले एक हिंदू राष्ट्र था, 2008 में राजतंत्र के खात्मे के बाद धर्मनिरपेक्ष देश बना. लेकिन इस बदलाव ने सांप्रदायिक तनाव को जन्म दिया. हाल के वर्षों में कई बार सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं सामने आई हैं. कुछ समूह अब राजतंत्र और हिंदू राष्ट्र की वापसी की मांग कर रहे हैं. पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह की लोकप्रियता आज भी बरकरार है, और कई लोग मानते हैं कि वह फिर से सत्ता में लौट सकते हैं.
भारत और चीन के बीच नेपाल की रणनीतिक स्थिति
नेपाल की भौगोलिक स्थिति इसे भारत और चीन के बीच एक रणनीतिक बिंदु बनाती है. भारत ने हाल ही में उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे को व्यापार के लिए खोला, जिसका ओली ने कड़ा विरोध किया. दूसरी ओर, चीन के साथ नेपाल के बढ़ते आर्थिक संबंधों ने भारत और अमेरिका को चिंतित किया है. विश्लेषकों का मानना है कि नेपाल की अशांति ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ और ‘मिलेनियम चैलेंज कॉरपोरेशन’ के बीच एक छद्म युद्ध का परिणाम हो सकती है.
श्रीलंका और बांग्लादेश से तुलना
नेपाल की मौजूदा स्थिति की तुलना 2022 में श्रीलंका और 2024 में बांग्लादेश में हुए जन-आंदोलनों से की जा रही है. श्रीलंका में आर्थिक संकट और भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रदर्शनों ने तत्कालीन राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे को देश छोड़ने के लिए मजबूर किया था. इसी तरह, बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार का पतन हुआ, और वह भारत में शरण लेने को मजबूर हुईं. दोनों देशों में चीन का बड़ा निवेश था, और नेपाल में भी यही पैटर्न देखा जा रहा है. कुछ विश्लेषक मानते हैं कि इन आंदोलनों में अमेरिका की रणनीतिक भूमिका हो सकती है, जो भारत-प्रशांत क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है.
भविष्य की अनिश्चितता
नेपाल में सेना के नियंत्रण के बावजूद स्थिति सामान्य होने के आसार नहीं दिख रहे. प्रदर्शनकारी सड़कों पर हैं, और हिंसा का दौर जारी है. काठमांडू में मेयर बालेंद्र शाह के नेतृत्व की मांग बढ़ रही है, लेकिन क्या वह इस संकट को संभाल पाएंगे? नेपाल की पूर्व जस्टिस सुशीला कार्की का भी नाम नये नेतृत्व के लिये उभर रहा है. क्या नेपाल में राजतंत्र की वापसी होगी, या यह देश और गहरे अस्थिरता में डूबेगा? इन सवालों का जवाब भविष्य के गर्भ में है.