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महानदी जल विवाद: मध्यस्थता से ही समाधान संभव- पूर्व न्यायाधीश

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14 अक्टू. 2025, 03:15 PM 3 मिनट में पढ़ें 2

जस्टिस गोपाल गौड़ा
जस्टिस गोपाल गौड़ा

नई दिल्ली । डेस्क: ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच चल रहे महानदी जल विवाद को हल करने के लिए लंबे मुकदमेबाजी के बजाय मध्यस्थता ही एकमात्र व्यवहार्य रास्ता है. यह बात सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और उड़ीसा हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस वी.जी. गोपाला गौड़ा कही.


उन्होंने कहा कि मध्यस्थता से "तेजी से समाधान मिल सकता है और यह इसमें शामिल सभी पक्षों के लिए परस्पर लाभकारी साबित होगा." जस्टिस गौड़ा ने प्रधानमंत्री से इस विवाद में हस्तक्षेप करने और मामलों को अधिकरणों (ट्रिब्यूनल्स) के माध्यम से घसीटने देने के बजाय मध्यस्थता प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने का आह्वान किया.

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वह नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में महानदी बचाओ आंदोलन द्वारा आयोजित महानदी संसद में बोल रहे थे. इस आंदोलन ने लंबे समय से नदी की सुरक्षा और इस पर निर्भर समुदायों के जल अधिकारों के लिए अभियान चलाया है.


न्यायिक प्रक्रिया में देरी पर चिंता

जस्टिस गौड़ा ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा मार्च 2018 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर महानदी जल विवाद अधिकरण के गठन के बाद से "बहुत कम प्रगति" हुई है. उन्होंने कावेरी विवाद जैसे अन्य मामलों का हवाला देते हुए चेतावनी दी कि "न्यायिक निर्णय वर्षों और दशकों तक खिंच सकता है." उन्होंने दोहराया कि मध्यस्थता का मार्ग एक तेज और निष्पक्ष समाधान की ओर ले जा सकता है.


जस्टिस गौड़ा ने वर्तमान राजनीतिक स्थिति की ओर भी इशारा किया: "चूंकि ओडिशा और छत्तीसगढ़ दोनों राज्यों में अब एक ही पार्टी– भाजपा– की सरकार है, इसलिए मध्यस्थता के नेतृत्व वाले निपटारे की संभावना पहले से कहीं बेहतर है."


उन्होंने यह भी याद दिलाया कि अधिकरण को पहले ही दो बार विस्तार मिल चुका है और इसका मौजूदा कार्यकाल अप्रैल 2026 में समाप्त हो रहा है, फिर भी कोई निष्कर्ष नहीं निकला है.


आगामी मुख्यमंत्री बैठक

उनके अनुसार, दोनों राज्यों के बीच अधिकारी-स्तर की चर्चाएँ चल रही हैं, और उनके मुख्यमंत्रियों से नवंबर में मिलने की उम्मीद है. जस्टिस गौड़ा ने सुझाव दिया कि जब दोनों मुख्यमंत्री मिलें, तो उन्हें संयुक्त रूप से एक मध्यस्थ का प्रस्ताव करना चाहिए.


व्यापक सामाजिक-आर्थिक निहितार्थ

राज्यसभा सांसद और संसद की याचिका समिति के अध्यक्ष, एन.डी. गुप्ता ने कहा कि इस मुद्दे को केवल एक अंतर-राज्यीय जल विवाद के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि महानदी संघर्ष के दूरगामी सामाजिक और आर्थिक निहितार्थ हैं.


महानदी बचाओ आंदोलन के संयोजक, सुदर्शन दास ने बताया कि संसद ने ओडिशा के लाखों लोगों के हितों की रक्षा के लिए बहु-आयामी रणनीति अपनाने का संकल्प लिया है. उन्होंने जोर दिया कि "बातचीत में सभी हितधारकों को शामिल किया जाना चाहिए और इसे सरकारी गलियारों तक सीमित नहीं रहना चाहिए."


संगठन ने प्रदूषण, अत्यधिक जल-निष्कर्षण और अतिक्रमण के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए महानदी यात्रा, छत्तीसगढ़ में नदी के उद्गम से लेकर बंगाल की खाड़ी में उसके संगम तक पूरे मार्ग को कवर करने वाले एक अभियान की भी घोषणा की.


महानदी छत्तीसगढ़ से निकलती है, ओडिशा से होकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है, और निचले हिस्से में लाखों लोगों के लिए जीवनरेखा का काम करती है. विवाद तब शुरू हुआ जब छत्तीसगढ़ ने 2004 से 2016 के बीच ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में कई बांधों और बैराजों का निर्माण शुरू किया. ओडिशा का तर्क है कि इन संरचनाओं ने पर्यावरण मानदंडों का उल्लंघन किया है और निचले क्षेत्रों में जल प्रवाह को नाटकीय रूप से कम कर दिया है. (फोटो- फाइल फोटो)

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP