वोटर लिस्ट को नागरिकता से अलग रखें- नागरिक समाज की हुंकार
वोटर लिस्ट को नागरिकता से अलग रखे- नागरिक समाज की हुंकार
नई दिल्ली । डेस्क: नई दिल्ली में सिविल सोसाईटी संगठनों द्वारा आयोजित एक राष्ट्रीय सम्मेलन में मतदाता सूची के पुनरीक्षण को नागरिकता के निर्धारण से पूरी तरह अलग करने की जोरदार मांग की गई. भारत जोड़ो अभियान, पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) और नेशनल एलायंस फॉर पीपुल्स मूवमेंट्स (NAPM) द्वारा आयोजित इस सम्मेलन में 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए सभी पात्र मतदाताओं के नाम वापस जोड़ने का प्रस्ताव पारित किया गया.
कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित इस सार्वजनिक सुनवाई में पूर्व न्यायाधीशों, शिक्षाविदों और कार्यकर्ताओं की एक जूरी ने उन लोगों की गवाही सुनी, जिनके नाम मौजूदा SIR प्रक्रिया के कारण गलत तरीके से हटा दिए गए हैं.
सुनवाई के दौरान छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों से आए लोगों ने बताया कि कैसे उन्हें गलत तरीके से मृत घोषित कर दिया गया या गणना फॉर्म के बारे में उचित जानकारी नहीं दी गई.
छत्तीसगढ़ के बस्तर के पूर्व विधायक और आदिवासी नेता मनीष कुंजाम ने सलवा जुडूम के दौरान विस्थापित हुए ग्रामीणों को मतदाता सूची से बाहर किए जाने का मुद्दा भी उठाया. इस अवसर पर उन बूथ स्तर के अधिकारियों (BLO) के परिवारों ने भी अपनी व्यथा साझा की, जिन्होंने इस कार्य के अत्यधिक दबाव में अपनी जान गंवा दी.
जूरी में शामिल पूर्व न्यायमूर्ति मदन बी. लोकुर और न्यायमूर्ति ए.के. पटनायक ने पूरी प्रक्रिया पर गंभीर चिंता व्यक्त की. न्यायमूर्ति लोकुर ने चुनाव आयोग से हर कदम पर जनता को विश्वास में लेने का आग्रह किया, जबकि न्यायमूर्ति पटनायक ने चेतावनी दी कि मतदाता सूची को आधार से जोड़ने से न केवल मताधिकार छीनेगा, बल्कि नागरिक सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से भी वंचित हो सकते हैं.
सम्मेलन में मांग की गई कि मतदाता सूची के नियमित संशोधन के लिए घर-घर जाकर सत्यापन करने की पुरानी और विश्वसनीय पद्धति को ही अपनाया जाए.