जुरासिक पार्क की कल्पना सही: मच्छरों के खून में छिपा है जानवरों का DNA
नई दिल्ली । डेस्क: स्टीवन स्पीलबर्ग की चर्चित फिल्म जुरासिक पार्क में दिखाया गया था कि एक जीवाश्म मच्छर के खून से डायनासोर का डीएनए निकालकर उन्हें दोबारा जीवित किया गया. उस समय यह पूरी तरह कल्पना लगती थी. लेकिन अब विज्ञान ने इस कहानी के एक हिस्से को सच के काफी करीब ला दिया है. नई वैज्ञानिक रिसर्च में सामने आया है कि मच्छर वास्तव में कई अलग-अलग जानवरों का डीएनए अपने शरीर में ढो सकते हैं.
यह रिसर्च अमेरिका के मध्य फ्लोरिडा में की गई, जिसका नेतृत्व जाने-माने कीट विज्ञानी (एंटोमोलॉजिस्ट) लॉरेंस रीव्स ने किया. दिलचस्प बात यह है कि खुद रीव्स मानते हैं कि मच्छरों पर इस तरह के अध्ययन के लिए उन्हें प्रेरणा जुरासिक पार्क फिल्म से ही मिली थी. उनके शब्दों में, “लोग कहते हैं कि जुरासिक पार्क ने जीवाश्म विज्ञान में रुचि बढ़ाई, लेकिन मेरे लिए इसने मच्छरों पर शोध का रास्ता खोला.”
डीएनए यानी डिऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड किसी भी जीव का जैविक खाका होता है. इसमें उस जीव की बनावट, गुण और पहचान से जुड़ी तमाम जानकारियां छिपी होती हैं. वैज्ञानिकों ने यह जानने की कोशिश की कि क्या मच्छरों द्वारा चूसे गए खून में मौजूद डीएनए का इस्तेमाल किसी इलाके की जैव विविधता समझने में किया जा सकता है.
इसके लिए शोधकर्ताओं ने फ्लोरिडा के करीब 10,900 हेक्टेयर के एक संरक्षित क्षेत्र को चुना. आठ महीनों तक चले इस अध्ययन में 21 अलग-अलग प्रजातियों के 50 हजार से ज्यादा मच्छर पकड़े गए. इनमें से हजारों मादा मच्छरों को अलग कर उनके शरीर में मौजूद खून की जांच की गई. दरअसल, नर मच्छर खून नहीं पीते, केवल मादा मच्छर ही प्रजनन के लिए दूसरे जीवों का खून चूसती हैं.
रिसर्च के नतीजे चौंकाने वाले रहे. मादा मच्छरों के शरीर में मौजूद खून से कुल 86 अलग-अलग प्रजातियों के जानवरों का डीएनए मिला. इनमें छोटे मेंढक, पक्षी, गाय जैसे पालतू जानवर, शिकारी जीव और यहां तक कि कुछ दुर्लभ व विलुप्तप्राय प्रजातियां भी शामिल थीं. वैज्ञानिकों का दावा है कि उस इलाके में मौजूद लगभग 80 प्रतिशत कशेरुकी जानवरों का डीएनए मच्छरों के नमूनों में दर्ज हो गया.
हालांकि कुछ अपवाद भी सामने आए. फ्लोरिडा पैंथर जैसे विलुप्तप्राय स्तनधारी और जमीन के भीतर रहने वाले ईस्टर्न मोल का डीएनए मच्छरों के खून में नहीं मिला. इसके बावजूद वैज्ञानिक मानते हैं कि यह तरीका पारंपरिक पशु गणना की तुलना में कहीं ज्यादा आसान और सस्ता हो सकता है.
बाद में जैव वैज्ञानिक सेबेस्टियन बोटेरो-काओला के नेतृत्व में हुई दूसरी रिसर्च में पाया गया कि बरसात के मौसम में, जब मच्छर सबसे ज्यादा सक्रिय होते हैं, तब यह तरीका लगभग पशु जनगणना जितना प्रभावी हो जाता है.
हालांकि वैज्ञानिक साफ करते हैं कि जीवाश्म मच्छरों से डायनासोर का डीएनए निकालना अभी भी असंभव है. लेकिन मच्छरों के जरिए जैव विविधता का आकलन करना भविष्य में कई प्रजातियों को विलुप्त होने से बचाने में अहम भूमिका निभा सकता है. शोधकर्ताओं के मुताबिक, जहां मच्छरों की संख्या ज्यादा है, वहां यह तरीका संरक्षण विज्ञान के लिए एक नया और कारगर हथियार साबित हो सकता है.
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