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क्या ट्रंप और कलिबाफ के बीच गुप्त बातचीत से थमेगी जंग?

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25 मार्च 2026, 03:45 AM 3 मिनट में पढ़ें 1

मोहम्मद बागेर कलिबाफ
मोहम्मद बागेर कलिबाफ

नई दिल्ली । डेस्क: मध्य पूर्व में जारी भीषण सैन्य संघर्ष के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक हालिया दावे ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है. ट्रंप ने सोमवार को ईरान के पावर ग्रिड और बिजली बुनियादी ढांचे पर होने वाले हमलों को पांच दिनों के लिए टालने का आदेश देते हुए दावा किया कि वाशिंगटन और तेहरान के बीच युद्ध समाप्त करने को लेकर "बेहद उत्पादक" बातचीत हुई है. ट्रंप का इशारा ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बागेर कलिबाफ की ओर है, जिन्हें अमेरिकी और इजरायली मीडिया रिपोर्ट्स में ट्रंप के दूतों स्टीव विटकॉफ और जारेड कुशनर का संपर्क सूत्र बताया जा रहा है. 


हालांकि, इस दावे ने एक बड़े कूटनीतिक और संवैधानिक सवाल को जन्म दे दिया है. क्या वास्तव में कलिबाफ के पास इतनी अथॉरिटी है कि वे ईरान की ओर से कोई समझौता वार्ता शुरू कर सकें?

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एक तरफ डोनाल्ड ट्रंप के पास अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में वह व्यापक राजनीतिक और संवैधानिक शक्ति है, जिसके दम पर वे सीधे तौर पर शत्रु देशों से बातचीत का निर्णय ले सकते हैं और युद्ध विराम की घोषणा कर सकते हैं. लेकिन ईरान की जटिल सत्ता संरचना में मोहम्मद बागेर कलिबाफ की स्थिति वैसी नहीं है. कलिबाफ भले ही संसद के अध्यक्ष और पूर्व IRGC कमांडर रहे हों, लेकिन ईरानी तंत्र में युद्ध और शांति जैसे गंभीर विषयों पर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार केवल 'सुप्रीम लीडर' (सर्वोच्च नेता) के पास होता है. 


पूर्व सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मृत्यु के बाद अब यह जिम्मेदारी मोज्तबा खामेनेई और 'सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद' के कंधों पर है. ऐसे में यह कल्पना करना कठिन है कि कलिबाफ, रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) और सर्वोच्च नेता को विश्वास में लिए बिना वार्ता की मेज पर आगे बढ़ सकते हैं. निश्चित तौर पर, बिना शीर्ष नेतृत्व की अनुमति के किसी भी समझौते की कोई कानूनी या राजनीतिक वैधता नहीं होगी.


यही कारण है कि कलिबाफ और ईरानी विदेश मंत्रालय ने ट्रंप के दावों को सिरे से खारिज कर दिया है. कलिबाफ ने इसे बाजार को प्रभावित करने वाली "फेक न्यूज" करार दिया है. लेकिन कूटनीति की दुनिया में अक्सर जो दिखता है, वह होता नहीं. यह पूरी तरह संभव है कि ईरान के प्रतिनिधि ट्रंप के दूतों से गुप्त बातचीत कर रहे हों, लेकिन अपनी घरेलू राजनीति और रणनीतिक स्थिति को देखते हुए फिलहाल इसे दुनिया के सामने स्वीकार नहीं करना चाहते. 


ईरान इस समय भारी दबाव में है. उसकी ऊर्जा संपदा और बुनियादी ढांचे पर हमलों का खतरा मंडरा रहा है. ऐसे में पर्दे के पीछे चल रही बातचीत एक 'बैक-चैनल' कूटनीति हो सकती है, जिसे सफलता मिलने तक गोपनीय रखा जा रहा है.


हालांकि, सबसे बड़ा रोड़ा 'अविश्वास' का है. ईरान पहले भी परमाणु समझौते (JCPOA) के दौरान अमेरिका से "धोखा" खा चुका है, जब ट्रंप ने अपने पिछले कार्यकाल में एकतरफा तरीके से समझौते से हाथ खींच लिए थे. क्या ईरान दोबारा उसी व्यक्ति पर भरोसा करेगा जिसने उस पर 'अधिकतम दबाव' की नीति थोपी थी? 


फिलहाल यह सब भविष्य के गर्भ में है. क्या कलिबाफ को एक मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है या वे वास्तव में सत्ता के शीर्ष केंद्रों के संदेशवाहक हैं, यह आने वाले पांच दिनों का 'होल्ड फायर' तय करेगा. 


यदि हमले दोबारा शुरू होते हैं, तो यह साफ हो जाएगा कि कूटनीति के ये दावे केवल मनोवैज्ञानिक युद्ध का हिस्सा थे, लेकिन यदि शांति की दिशा में कोई ठोस कदम दिखता है, तो यह मध्य पूर्व के इतिहास का सबसे बड़ा उलटफेर साबित हो सकता है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP