वंदे मातरम विवाद: पूरा गाना न गाने वालों पर केस नहीं, SC की टिप्पणी
नई दिल्ली । डेस्क: राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम में वर्ष 2026 में किए गए हालिया संशोधन की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है. इस याचिका में वंदे मातरम गाने के लिए मजबूर करने और न गाने या इसके गायन में बाधा डालने पर तीन साल की जेल की सजा के प्रावधान को चुनौती दी गई है. कर्नाटक संगीत के प्रसिद्ध गायक टी.एम. कृष्णा की ओर से दायर इस याचिका पर मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्या कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई की.
बीजोय इमैनुएल फैसले का संदर्भ और अदालत की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने राष्ट्रीय गान न गाने के अधिकार से जुड़े ऐतिहासिक बीजोय इमैनुएल मामले का उल्लेख किया. उन्होंने स्पष्ट संकेत दिया कि अपने धार्मिक या वैचारिक कारणों से वंदे मातरम के कुछ या सभी छंदों का गान न करने वाले व्यक्तियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही नहीं होनी चाहिए.
अदालत की इस टिप्पणी को रेखांकित करते हुए पीठ ने कहा, "हम उम्मीद करेंगे कि इस अदालत द्वारा बीजोय इमैनुएल मामले में घोषित देश का कानून, इस कानून की व्याख्या और क्रियान्वयन को संचालित करेगा. बीजोय इमैनुएल मामले में कानून की जो घोषणा की गई है, उस पर अब तक कोई सवाल नहीं उठाया गया है."
छह छंदों की अनिवार्यता और धार्मिक आपत्तियां
टी.एम. कृष्णा की याचिका में गृह मंत्रालय के उन निर्देशों को खारिज करने की मांग की गई है, जिनमें सरकारी, औपचारिक और सांस्कृतिक आयोजनों में वंदे मातरम के सभी छह छंदों का गायन अनिवार्य किया गया है. याचिकाकर्ता का तर्क है कि इस गीत के अंतिम चार छंदों (तीसरे से छठे छंद) में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसी हिंदू देवियों का आह्वान किया गया है, जो इसे पूरी तरह से धार्मिक स्वरूप प्रदान करते हैं.
याचिका में कहा गया है कि नागरिकों को इन छंदों को गाने के लिए बाध्य करना उनके मौलिक अधिकारों-विशेष रूप से समानता (अनुच्छेद 14), भेदभाव के खिलाफ अधिकार (अनुच्छेद 15(1)), अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(a)), जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) और धर्म व विवेक की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25(1)) का प्रत्यक्ष उल्लंघन है. याचिकाकर्ता के अनुसार, केवल दो छंद ही मूल रूप से देशभक्ति के प्रतीक थे, जबकि बाकी चार छंद बाद में उपन्यास 'आनंदमठ' का हिस्सा बनते समय जोड़े गए थे.
राष्ट्रीय गीत की परिभाषा और अस्पष्ट कानून पर सवाल
वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर ने याचिकाकर्ता की ओर से पक्ष रखते हुए कानून की अस्पष्टता पर गंभीर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि अधिनियम में 'राष्ट्रीय गीत' शब्द को स्पष्ट रूप से परिभाषित ही नहीं किया गया है, जिससे इसका दुरुपयोग होने की पूरी संभावना है. मुरलीधर ने दलील दी कि किसी भी दंडात्मक कानून में इतनी अस्पष्टता नहीं होनी चाहिए कि बिना किसी आधिकारिक गजट अधिसूचना या कानूनी परिभाषा के केवल एक कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) के आधार पर जेल की सजा का प्रावधान लागू कर दिया जाए.
न्यायमूर्ति बागची ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 51A में भी 'राष्ट्रीय गीत' का अलग से उल्लेख नहीं है, लेकिन परंपराओं और रीति-रिवाजों के अनुसार वंदे मातरम के पहले दो छंदों को ही हमेशा राष्ट्रीय गीत के रूप में समझा गया है.
अदालत में तीखी बहस और सॉलिसिटर जनरल की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत से औपचारिक नोटिस जारी न करने का अनुरोध किया. उन्होंने तर्क दिया कि इस मामले को अनावश्यक रूप से सनसनीखेज बनाया जा रहा है और संसद द्वारा बनाया गया कानून ही संवैधानिक प्रक्रिया का सही प्रतिनिधित्व करता है.
बहस के दौरान जब सॉलिसिटर जनरल ने याचिका की मंशा पर सवाल उठाते हुए टिप्पणी की, तो याचिकाकर्ता के वकील एस. मुरलीधर ने इस पर कड़ा ऐतराज जताया. उन्होंने कहा कि एक वरिष्ठ कानून अधिकारी द्वारा इस तरह की शब्दावली का प्रयोग करना बिल्कुल अनुचित है. इसके बावजूद सॉलिसिटर जनरल ने अपनी टिप्पणी वापस लेने से इनकार कर दिया.
फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से दो हफ़्तों में अपना रुख स्पष्ट करने को कहा है, जबकि याचिकाकर्ता ने संशोधित धारा 3 को रद्द करने और अंतिम फैसला आने तक इसके क्रियान्वयन पर रोक लगाने की मांग की है.