अमेरिका के सांसद ने जताई FCRA संशोधन पर चिंता
नई दिल्ली । डेस्क: भारत में गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), ट्रस्टों, शैक्षणिक संस्थानों और धार्मिक संस्थाओं द्वारा प्राप्त होने वाले विदेशी अंशदान को नियंत्रित करने वाले कानून (FCRA) में प्रस्तावित संशोधनों को लेकर अमेरिका के एक प्रमुख सांसद ने गहरी चिंता व्यक्त की है. अमेरिकी कांग्रेसमैन राइली मूर ने कहा कि विदेश अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित कर सकता है.
मूर का तर्क है कि ये संशोधन सरकार को चर्चों और धार्मिक चैरिटी संस्थाओं के अधिग्रहण की अनुमति देंगे, जिसे उन्होंने ईसाइयों के खिलाफ एक प्रत्यक्ष कदम बताया.
प्रस्तावित FCRA विधेयक, 2026 के तहत यदि किसी संस्था का FCRA पंजीकरण रद्द, सरेंडर या नवीनीकृत नहीं होता है, तो सरकार को उनके विदेशी अंशदान और उससे बनाई गई संपत्तियों का प्रबंधन संभालने के लिए एक 'नामित प्राधिकारी' (Designated Authority) नियुक्त करने का अधिकार मिलेगा.
हालांकि, विधेयक में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि संपत्तियां पूजा स्थल हैं, तो प्राधिकारी को उनके धार्मिक स्वरूप को बनाए रखना होगा. इसके अलावा, नए नियमों में उल्लंघन पर अधिकतम सजा को पांच साल से घटाकर एक साल कर दिया गया है, जबकि नवीनीकरण के लिए न्यूनतम 10 लाख रुपये के विदेशी योगदान के उपयोग की शर्त रखी गई है.
भारत सरकार इन संशोधनों को पारदर्शिता, जवाबदेही और विदेशी धन के सही उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए एक आवश्यक कदम बता रही है.
दूसरी ओर, विपक्षी दलों, नागरिक समाज समूहों और विशेष रूप से केरल जैसे राज्यों के चर्च संगठनों ने इसका कड़ा विरोध किया है. उनका मानना है कि इन कड़े नियमों से दशकों से चल रहे स्कूलों, अस्पतालों और कल्याणकारी संस्थानों पर सरकारी नियंत्रण का खतरा बढ़ जाएगा. आंकड़ों के अनुसार, भारत में वर्तमान में 14,449 सक्रिय FCRA प्रमाण पत्र हैं, जबकि 22,000 से अधिक रद्द किए जा चुके हैं.