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दिल्ली को 'एक तीर से दो निशाना' साधना चाहते हैं ट्रंप?

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11 सित. 2025, 03:05 AM 4 मिनट में पढ़ें 2

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नई दिल्ली । डेस्क: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत के प्रति सख्त नीतियों ने देश के सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) क्षेत्र में भारी संकट के बादल मंडराने शुरू कर दिए हैं. उद्योग जगत में आशंका है कि यदि वस्तुओं की तरह सेवाओं पर भी 50% शुल्क लगाया गया तो अमेरिकी कंपनियां भारत से किनारा कर सकती हैं, जिससे भारत का 28,300 करोड़ डॉलर का आईटी उद्योग प्रभावित होगा. 


ट्रंप के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में सभी आउटसोर्सिंग पर शुल्क लगाने की वकालत की, जिसे भारत के लिए स्पष्ट संदेश माना जा रहा है. नवारो, जो ट्रंप प्रशासन के प्रभावशाली व्यक्तियों में से एक हैं, ने पहले भारत को 'शुल्क का महाराजा' करार दिया था. उन्होंने दावा किया कि भारत विश्व में सबसे अधिक शुल्क वसूलता है, जिससे अमेरिकी श्रमिकों और करदाताओं को नुकसान हो रहा है. उन्होंने भारत के रूस और चीन के साथ बढ़ती नजदीकियों पर भी सवाल उठाए, खासकर रूस से तेल खरीद को लेकर.

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ट्रंप की सहयोगी और दक्षिणपंथी कार्यकर्ता लॉरा लूमर ने भी इस मुद्दे को हवा दी. उन्होंने X पर पोस्ट कर मांग की कि कॉल सेंटर जैसे आउटसोर्सिंग कार्य अमेरिका वापस लाए जाएं, न कि विदेशों में दिए जाएं. यह बयान भारत के आईटी सेक्टर को सीधे निशाना बनाता है, जो अमेरिकी कंपनियों पर 60% निर्भर है. 


टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस), इंफोसिस, एचसीएल टेक और विप्रो जैसी कंपनियां अमेरिकी ग्राहकों के साथ मजबूत व्यापारिक रिश्तों पर आधारित हैं. सस्ते और कुशल श्रम के कारण सिलिकॉन वैली की दिग्गज कंपनियां भारत को आउटसोर्सिंग हब के रूप में पसंद करती हैं. यहां कर्मचारियों को अमेरिकी उच्चारण में प्रशिक्षित किया जाता है ताकि वे अमेरिकी ग्राहकों को बेहतर ग्राहक सहायता प्रदान कर सकें. यदि सेवाओं पर 50% शुल्क लगाया गया तो लागत बढ़ने से अमेरिकी कंपनियां अनुबंध रद्द कर सकती हैं या नए समझौते करने से बच सकती हैं, जिससे भारत में छंटनी और मंदी का खतरा बढ़ेगा.


27 अगस्त, 2025 से ट्रंप प्रशासन ने भारतीय वस्त्र, चमड़ा, आभूषण, और रासायनिक उत्पादों पर 50% शुल्क लागू कर दिया है, जो भारत के 86.5 अरब डॉलर के निर्यात को 2026 तक 50 अरब तक कम कर सकता है. हालांकि, अभी तक आईटी सेवाओं पर शुल्क की घोषणा नहीं हुई है, लेकिन नवारो और लूमर जैसे ट्रंप के करीबियों के बयानों से संकेत मिलता है कि यह क्षेत्र जल्द ही निशाने पर आ सकता है. 


ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के अनुसार, इन शुल्कों से भारत के निर्यात में 70% तक की कमी आ सकती है, जिससे लाखों नौकरियां खतरे में पड़ सकती हैं.


इसके अलावा, ट्रंप प्रशासन ने रेमिटेंस पर 1% टैक्स लगा दिया है, और 5% टैक्स का प्रस्ताव विचाराधीन है. भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार, 2023-24 में भारत को प्राप्त रेमिटेंस का 27.7% अमेरिका से आया. यदि यह बिल पास हुआ तो विदेशी मुद्रा का प्रवाह कम होगा, जिससे भारत की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा. 


साथ ही, एच-1बी वीजा पर सख्ती बढ़ रही है, जो भारतीय आईटी पेशेवरों के लिए महत्वपूर्ण है. वर्तमान में 72% एच-1बी वीजा भारतीयों को मिलते हैं, जो 6 साल तक वैध होता है. 2020 में ट्रंप ने इसे अस्थायी रूप से निलंबित किया था. नई सख्ती से सिलिकॉन वैली में भारतीय पेशेवरों की राह मुश्किल हो सकती है.


अंतर्राष्ट्रीय व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप 2026 के मध्यावधि चुनावों से पहले 'अमेरिका फर्स्ट' नीति के तहत अमेरिकी नागरिकों को नौकरियां देकर राजनीतिक लाभ लेना चाहते हैं. 


भारत से आउटसोर्सिंग रोककर और स्थानीय भर्ती को बढ़ावा देकर ट्रंप अपनी छवि मजबूत करना चाहते हैं. इससे भारत के आईटी सेक्टर में मंदी, छंटनी और आर्थिक चुनौतियां बढ़ सकती हैं. 


कंपनियां अब हाइब्रिड डिलीवरी मॉडल और स्थानीय भर्ती पर विचार कर रही हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय कंपनियों को इस संकट से निपटने के लिए नवाचार और लचीलापन अपनाना होगा. (फोटो- प्रतीकात्मक)

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP