डोनाल्ड ट्रंप और नेतन्याहू के बीच बढ़ा तनाव
वाशिंगटन/तेल अवीव । डेस्क: इजरायल और ईरान के बीच हाल ही में भड़की सैन्य दुश्मनी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच के राजनीतिक समीकरणों को हिलाकर रख दिया है. जानकारों का मानना है कि दोनों नेताओं के बीच यह अब तक की सबसे बड़ी दरार है, जिसने दोनों देशों के विरोधाभासी हितों को खुलकर दुनिया के सामने ला दिया है.
कभी एक-दूसरे के सबसे बड़े राजनीतिक हितैषी माने जाने वाले ट्रंप और नेतन्याहू के रिश्ते अब पूरी तरह तनावपूर्ण हो चुके हैं. रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने पिछले दिनों एक फोन कॉल के दौरान नेतन्याहू के प्रति सख्त नाराजगी जाहिर की और चेतावनी दी कि इजरायल का आक्रामक रुख अमेरिका की कूटनीतिक कोशिशों और ईरान के साथ होने वाली शांति वार्ता को खतरे में डाल रहा है.
इस तनाव की मुख्य वजह रविवार को ईरान द्वारा उत्तरी इजरायल पर दागी गईं मिसाइलें हैं, जो बेरूत में इजरायली हमले के बाद जवाबी कार्रवाई के रूप में आईं. इस घटना ने पाकिस्तान की मध्यस्थता से हुए दो महीने पुराने नाजुक युद्धविराम को संकट में डाल दिया है. दरअसल, ट्रंप और नेतन्याहू के रास्ते फरवरी में ईरान पर किए गए संयुक्त मिसाइल हमलों के बाद ही अलग होने लगे थे.
इजरायली नेतृत्व को उम्मीद थी कि इस युद्ध से ईरान में सत्ता परिवर्तन हो जाएगा और उसका परमाणु कार्यक्रम हमेशा के लिए तबाह हो जाएगा, लेकिन रणनीतिक रूप से यह अनुमान पूरी तरह विफल रहा. उल्टा इस संघर्ष के कारण ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया, जिससे दुनिया भर में तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं.
अमेरिका में नवंबर के मिड-टर्म चुनावों को देखते हुए बढ़ती ईंधन दरें ट्रंप के लिए भारी राजनीतिक नुकसान का कारण बन सकती हैं, इसलिए वे जल्द से जल्द ईरान के साथ समझौता कर शांति बहाल करना चाहते हैं. इसके विपरीत, नेतन्याहू के लिए युद्ध का जारी रहना उनके घरेलू राजनीतिक वजूद के लिए फायदेमंद साबित हो रहा है.
विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप और नेतन्याहू का रिश्ता बेहद व्यावसायिक रहा है. ट्रंप अपने हितों के आगे किसी और को तरजीह नहीं देते. वर्तमान में इजरायल पूरी तरह से अमेरिकी सैन्य और वित्तीय मदद पर निर्भर है. इजरायल को मिलने वाले कुल हथियारों का 42 प्रतिशत हिस्सा अकेले अमेरिका से आता है, ऐसे में इजरायल के पास ट्रंप की बात मानने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचता.
हालांकि, युद्धविराम का यह अमेरिकी प्रयास नेतन्याहू की घरेलू राजनीति से सीधे टकराता है. इजरायल में ईरान के खिलाफ युद्ध को जनता का भारी समर्थन हासिल है. अक्टूबर में होने वाले चुनावों और पिछले छह साल से चल रहे भ्रष्टाचार के मुकदमे के बीच नेतन्याहू के लिए सत्ता में बने रहना जीवन-मरण का सवाल है.
इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) के वारंट ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दी हैं. ऐसे में ईरान से समझौता उनके दक्षिणपंथी गठबंधन को तोड़ सकता है, जो उनके मंत्रियों की ओर से ट्रंप को मिल रही 'रेड लाइन' की धमकियों से साफ झलकता है.
इसके बावजूद, कुछ विशेषज्ञ इसे केवल एक दिखावा मानते हैं क्योंकि इस तीखी बयानबाजी के बाद भी अमेरिका द्वारा इजरायल को दी जाने वाली अरबों डॉलर की सैन्य सहायता और हथियारों की आपूर्ति पर कोई रोक नहीं लगी है.