रवि, 18 अक्टू. 2026

CGKhabar

दिल्ली मेट्रो स्टेशन बंद करने और प्रदर्शनकारियों की हिरासत पर SC सख्त: दिए 6 बड़े निर्देश

C

CG Khabar

11 अक्टू. 2026, 07:39 AM 6 मिनट में पढ़ें 3

सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली । डेस्क: राष्ट्रीय राजधानी में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के विरोध प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक परिवहन को बाधित करने और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है. शीर्ष अदालत ने रविवार को एक विशेष सुनवाई के दौरान दिल्ली के मेट्रो स्टेशनों को बंद किए जाने पर दिल्ली प्रशासन से जवाब तलब किया. अदालत ने प्राधिकारियों से पूछा कि 10 अक्टूबर को मेट्रो स्टेशनों को बंद करके उसके निर्देशों का उल्लंघन करने के लिए उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए.


न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई करते हुए केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार और दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (डीएमआरसी) की अध्यक्ष डी. थारा को कारण बताओ नोटिस जारी किया है. अदालत ने अधिकारियों को एक संक्षिप्त हलफनामा दाखिल करने और अपने आदेशों के अनुपालन की रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है.

विज्ञापन


मेट्रो बंदी पर सुप्रीम कोर्ट का रुख और प्रशासनिक दलीलें


मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) के खिलाफ सीजेपी द्वारा जंतर-मंतर पर आयोजित प्रदर्शन के कारण मध्य दिल्ली और आसपास के 45 मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए गए थे. वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा दायर अवमानना याचिका में आरोप लगाया गया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा 9 अक्टूबर को दिए गए आदेश के बावजूद मेट्रो स्टेशनों को बंद रखा गया, जिसमें स्पष्ट कहा गया था कि प्रदर्शनों से पहले सार्वजनिक परिवहन को पूरी तरह बंद नहीं किया जाना चाहिए.


सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि मेट्रो परिचालन की मात्रा में कोई कमी नहीं की गई थी और पूरे नेटवर्क में कुल 4,157 ट्रेन ट्रिप संचालित की गई थीं. उन्होंने बताया कि नेटवर्क के 303 स्टेशनों में से केवल 45 स्टेशनों को बंद किया गया था, जो कुल नेटवर्क का 15 प्रतिशत है. हालांकि, पीठ ने इस दलील पर अधिक स्पष्टता मांगी. न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की कि यदि किसी सीधी लाइन के बीच के सभी स्टेशन बंद कर दिए जाते हैं, तो इससे लोगों की पहुंच पूरी तरह बाधित होती है. 


अदालत ने प्राधिकारियों को मानचित्र के माध्यम से यह दर्शाने का निर्देश दिया कि कौन से स्टेशन खुले थे और कौन से बंद थे, ताकि पहुंच और विनियमन की स्थिति स्पष्ट हो सके. सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को सूचित किया कि वर्तमान में सभी मेट्रो स्टेशन खोल दिए गए हैं और इंटरनेट सेवाएं भी बहाल कर दी गई हैं.


नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा हेतु छह प्रमुख निर्देश


मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकों की आवाजाही, इंटरनेट सेवाओं और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए छह प्रमुख निर्देश जारी किए:


पहला, मेट्रो और रेल सुविधाएं सामान्य रूप से संचालित होंगी, जब तक कि संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था में व्यवधान को ध्यान में रखते हुए कड़े नियम लगाना आवश्यक न हो. 


दूसरा, यातायात नियमों के अधीन शहर में लोगों की मुफ्त आवाजाही की अनुमति होगी और नागरिकों के सुचारू आवागमन में कोई बाधा उत्पन्न नहीं की जाएगी. 


तीसरा, पुलिस द्वारा लगाए गए बैरिकेड्स की तत्काल समीक्षा की जाएगी और कानून-व्यवस्था तथा यातायात की स्थिति को ध्यान में रखते हुए ही उन्हें बनाए रखा जाएगा. 


चौथा, इंटरनेट सुविधाएं कानून के अनुसार निर्बाध रहेंगी, हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि वह सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत सरकार के अधिकारों को नहीं छीन रही है. 


पांचवां, कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया को छोड़कर किसी भी व्यक्ति को अवैध रूप से हिरासत में नहीं लिया जाएगा, विशेष रूप से लागू प्रतिबंधात्मक क्षेत्रों से बाहर. 


छठा, शांतिपूर्ण सभा की अनुमति कानून के अनुसार दी जाएगी, विशेष रूप से उन क्षेत्रों के बाहर जहां भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 लागू नहीं है.


सुप्रीम कोर्ट परिसर से धारा 163 का नोटिस बोर्ड हटाने का आदेश


सुनवाई के दौरान अदालत को सूचित किया गया कि सुप्रीम कोर्ट परिसर के बाहर बीएनएसएस की धारा 163 लागू होने और पांच या अधिक लोगों के एकत्र होने पर प्रतिबंध का एक बोर्ड लगाया गया था. इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए पीठ ने संबंधित अधिकारियों को तुरंत उस बोर्ड को हटाने का निर्देश दिया. अदालत ने कहा कि नागरिकों और वकीलों को न्याय तक पहुंच प्राप्त करने का पूरा अधिकार है और ऐसी बाधाएं स्वीकार्य नहीं हैं.


साथ ही पीठ ने विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों को भी अपने कर्तव्यों की याद दिलाई. न्यायमूर्ति मोहना ने कहा कि यदि प्रदर्शनकारी सार्वजनिक कल्याण में रुचि रखते हैं, तो उन्हें शांतिपूर्ण ढंग से विरोध करने और दूसरों को न उकसाने का वचन देना चाहिए. वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने इस बात का समर्थन करते हुए कहा कि प्राधिकारियों की ओर से भी यह आश्वासन मिलना चाहिए कि वे शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के साथ कैसा व्यवहार करेंगे. इस पर न्यायमूर्ति बागची ने दोहराया कि अदालत अनुच्छेद 32 के तहत नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा और उन्हें लागू करने के लिए कर्तव्यबद्ध है.


पुलिस कार्रवाई को 'पुलिस स्टेट' जैसा बताने पर गरमाई बहस


तृणमूल कांग्रेस की सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी तथा अन्य वकीलों ने पुलिस की इस कार्रवाई को नागरिक स्वतंत्रता पर हमला करार दिया. गुरुस्वामी ने अदालत को बताया कि पूरे दिल्ली में लगभग 45 अस्थायी हिरासत केंद्र बनाए गए थे और चार पूर्व मुख्यमंत्रियों तथा सांसदों सहित लगभग 7,000 लोगों को हिरासत में लिया गया था. उन्होंने सवाल उठाया कि बिना आपातकाल घोषित किए नागरिकों के मौलिक अधिकारों को इस तरह कैसे छीना जा सकता है. उन्होंने इस स्थिति की तुलना 1975 के आपातकाल और एडीएम जबलपुर मामले से की.


वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत, जिन्हें पुलिस ने शनिवार को हिरासत में लिया था, ने अपने अनुभव को साझा करते हुए कहा कि राजधानी में स्थिति अत्यंत दमनकारी थी. उन्होंने कहा कि नागरिकों को सड़कों पर खड़े तक नहीं होने दिया जा रहा था और यह स्थिति देश को 'पुलिस स्टेट' बनने की ओर ले जा रही थी. वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन और पूर्व अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने भी वकीलों की अवैध हिरासत और पुलिस द्वारा बिना पहचान पत्र के की गई बर्बरता का मुद्दा उठाया.


दूसरी ओर, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं का विरोध करते हुए कहा कि हिरासत में लिए गए अधिकांश लोगों को कुछ ही घंटों के भीतर रिहा कर दिया गया था, इसलिए अब वे याचिकाएं निष्प्रभावी हो गई हैं. उन्होंने बार के सदस्यों से व्यवस्था पर विश्वास बनाए रखने की अपील की. सुप्रीम कोर्ट ने अब प्राधिकारियों को विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट और हलफनामा दाखिल करने का समय दिया है, जिसके आधार पर आगे की अवमानना कार्यवाही तय होगी.

यह खबर शेयर करें: WhatsApp Facebook
CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP