जापान में चावल के लिए हाहाकार
नई दिल्ली । संवाददाता: जापान में चावल, जो देश का सबसे प्रिय और महत्वपूर्ण खाद्य पदार्थ है, इस समय एक बड़े संकट का कारण बन गया है. पिछले एक साल में चावल की कीमतें लगभग दोगुनी हो गई हैं, जिससे आम लोगों का बजट प्रभावित हो रहा है और प्रधानमंत्री शिगेरु इशिबा की लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी की लोकप्रियता में कमी आ रही है.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल में चावल की कीमतों में पिछले साल की तुलना में 98.4% की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि मार्च में यह वृद्धि 92.5% थी.
लोकप्रिय कोशिहिकारी चावल की कीमत अब 5 किलोग्राम के लिए 5,000 येन (लगभग 35 डॉलर) तक पहुंच गई है, जबकि अन्य किस्में 4,200 येन (लगभग 29 डॉलर) में बिक रही हैं. सरकार ने आपातकालीन उपाय के तौर पर सरकारी भंडार से चावल जारी किया, लेकिन इससे कीमतों पर कोई असर नहीं पड़ा.
प्रधानमंत्री इशिबा ने संसद में कहा, "हमें नहीं पता कि हम कीमतों को कम क्यों नहीं कर पा रहे हैं." उन्होंने यह भी बताया कि सरकार अब यह पता लगाने की कोशिश करेगी कि कितना चावल बचा है और वह कहां है.
संकट के कारण
यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी सिडनी के मुख्य अर्थशास्त्री टिम हार्कोर्ट के अनुसार, इस संकट के तीन मुख्य कारण हैं-
भूकंप की आशंका में खरीदारी: ऑनलाइन अफवाहों के कारण, जिसमें एक बड़े भूकंप की आशंका जताई गई, लोगों ने घबराहट में चावल की जमाखोरी शुरू कर दी.
गेहूं की कमी: रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण गेहूं की कमी ने लोगों को चावल का उपयोग बढ़ाने के लिए मजबूर किया.
पर्यटन और आतिथ्य क्षेत्र में उछाल: जापान में पर्यटकों की बढ़ती संख्या और आतिथ्य उद्योग की मांग ने चावल की खपत को और बढ़ा दिया.
इसके अलावा, 2023 में असामान्य रूप से गर्म गर्मी ने चावल की फसलों को नुकसान पहुंचाया, जिससे उत्पादन में कमी आई. नतीजतन, कई रेस्तरां और उपभोक्ता अब स्थानीय चावल के बजाय सस्ते आयातित चावल का उपयोग कर रहे हैं, जो जापानी किसानों के लिए एक और चुनौती है.
राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव
चावल की बढ़ती कीमतों ने न केवल आर्थिक बल्कि राजनीतिक संकट भी पैदा कर दिया है. मई में प्रधानमंत्री इशिबा की स्वीकृति रेटिंग 27.4% तक गिर गई, जो अप्रैल से 5% कम है.
पूर्व कृषि मंत्री ताकु एतो को अपने एक असंवेदनशील बयान के कारण इस्तीफा देना पड़ा, जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्हें चावल खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि उन्हें समर्थकों से चावल उपहार में मिलता है.
नए कृषि मंत्री शिंजिरो कोइज़ ने वादा किया है कि वे 5 किलोग्राम चावल की कीमत को 3,000 येन तक लाने की कोशिश करेंगे.
सरकार के कदम
सरकार ने अब एक नई रणनीति अपनाई है, जिसमें सरकारी भंडार से चावल को बिना बोली के सीधे बड़े सुपरमार्केट और खुदरा विक्रेताओं को बेचा जाएगा.
इसका लक्ष्य जून की शुरुआत तक 5 किलोग्राम चावल की कीमत को 2,000 येन (लगभग 13.80 डॉलर) तक लाना है.
यह कदम पहले की तुलना में अधिक प्रभावी हो सकता है, क्योंकि पुरानी प्रणाली में उच्च बोली लगाने वालों को चावल बेचा जाता था, जिससे कीमतें कम नहीं हो पाईं.
भारत पर संभावित प्रभाव
जापान में चावल की बढ़ती कीमतों और स्थानीय उत्पादन में कमी के कारण आयातित चावल की मांग बढ़ रही है.
भारत, जो दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश है, इस स्थिति से लाभ उठा सकता है. भारतीय बासमती और गैर-बासमती चावल की मांग जापान में बढ़ सकती है, खासकर उन रेस्तरां और उपभोक्ताओं के बीच जो सस्ते विकल्प तलाश रहे हैं.
हालांकि, भारत से चावल निर्यात पर कोई प्रत्यक्ष प्रतिबंध नहीं है, लेकिन वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और मांग में उतार-चढ़ाव भारतीय निर्यातकों के लिए अवसर और चुनौतियां दोनों पैदा कर सकते हैं. जापान की सख्त गुणवत्ता आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भारतीय निर्यातकों को अपनी आपूर्ति की गुणवत्ता और मानकों पर विशेष ध्यान देना होगा.
आगे की राह
चावल की कीमतों को स्थिर करना इशिबा प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती है.
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सरकार सभी प्रकार के चावल, न कि केवल भंडारित चावल, की कीमतों को नियंत्रित करने में सफल नहीं हुई, तो उपभोक्ताओं के बीच असंतोष बढ़ सकता है. इसके साथ ही, आयातित चावल की बढ़ती मांग स्थानीय किसानों के लिए दीर्घकालिक नुकसान का कारण बन सकती है.
भारत जैसे देशों के लिए यह एक अवसर हो सकता है, बशर्ते वे जापान की मांग और गुणवत्ता मानकों को पूरा कर सकें. इस संकट का समाधान न केवल आर्थिक बल्कि जापान की सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि चावल जापानी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है.