रवि, 18 अक्टू. 2026

CGKhabar

बिहार-मध्यप्रदेश-झारखंड के 'VB-G RAM G' के फंडिंग फॉर्मूले पर सवाल

C

CG Khabar

28 जून 2026, 02:57 AM 3 मिनट में पढ़ें 3

VB-G RAM G
VB-G RAM G

नई दिल्ली । डेस्क: देश में आगामी 1 जुलाई से लागू होने जा रही नई ग्रामीण रोजगार योजना 'विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)' यानी VB-G RAM G के वित्तीय ढांचे को लेकर राज्यों ने मोर्चा खोल दिया है. विशेष रूप से बिहार, मध्य प्रदेश और झारखंड ने इस नई योजना के फंडिंग फॉर्मूले पर गंभीर सवाल उठाते हुए केंद्र सरकार से इस पर तुरंत पुनर्विचार करने की मांग की है. 


सूचना का अधिकार के तहत सामने आए दस्तावेजों से खुलासा हुआ है कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) की जगह लेने जा रही इस महत्वाकांक्षी योजना के कारण राज्यों के खजाने पर अचानक हजारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ने जा रहा है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के तय लक्ष्यों को पूरा करना नामुमकिन नजर आ रहा है.

विज्ञापन


विवाद की मुख्य जड़ केंद्र और राज्यों के बीच खर्च के बंटवारे का नया अनुपात है. पुरानी मनरेगा व्यवस्था के तहत ग्रामीण मजदूरों की मजदूरी का शत-प्रतिशत (100%) खर्च केंद्र सरकार उठाती थी, जबकि राज्यों को केवल सामग्री के खर्च का एक बहुत छोटा हिस्सा देना पड़ता था, जो कुल बजट का महज 10 प्रतिशत होता था. 


इसके विपरीत, नई VB-G RAM G योजना में राज्यों को कुल खर्च का 40 प्रतिशत हिस्सा खुद वहन करना होगा, जबकि केंद्र की हिस्सेदारी घटकर 60 प्रतिशत रह जाएगी. इस 60:40 के फंडिंग फॉर्मूले ने राज्यों के सामने एक अभूतपूर्व वित्तीय संकट खड़ा कर दिया है, जिसकी वजह से खुद भाजपा शासित राज्यों को भी केंद्र के सामने विरोध दर्ज कराना पड़ा है.


आंकड़ों और विशेषज्ञों के विश्लेषण से साफ है कि केंद्र द्वारा फिलहाल किया गया अंतरिम आवंटन राज्यों में रोजगार की गारंटी देने के लिए बेहद नाकाफी है. नए फॉर्मूले के तहत बिहार को अपने हिस्से के रूप में 4,477 करोड़ रुपये का भुगतान करना होगा, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि यह राशि सरकार के 125 दिन के रोजगार के वादे को पूरा करने के लिए बहुत कम है. बिहार को इस लक्ष्य को जमीन पर उतारने के लिए करीब 15,939 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि खर्च करनी होगी. 


इसी तरह, मध्य प्रदेश पर वित्तीय बोझ 4,168 करोड़ रुपये आंका गया है, जो राज्य में केवल 43 दिनों का रोजगार देने के लिए ही पर्याप्त होगा. यदि मध्य प्रदेश सरकार को 125 दिनों का रोजगार देना है, तो उसे अपने बजट से 20,037 करोड़ रुपये जुटाने होंगे. 


झारखंड की स्थिति भी अलग नहीं है, जहां 41 दिनों के रोजगार के लिए 1,804 करोड़ रुपये का आवंटन हुआ है, जबकि 125 दिनों की प्रतिबद्धता पूरी करने के लिए राज्य को 9,293 करोड़ रुपये की बड़ी रकम अपनी जेब से लगानी होगी. 


फंडिंग के इस विवादास्पद फॉर्मूले के अलावा, राज्यों ने योजना की अन्य व्यावहारिक दिक्कतों को लेकर भी अपनी चिंताएं साझा की हैं. कई राज्यों ने ग्रामीण श्रमिकों की मजदूरी को बाजार दरों के अनुरूप बढ़ाने की मांग की है, क्योंकि वर्तमान दरें काफी कम हैं. 


साथ ही, मुख्य कृषि सीजन के दौरान योजना को 60 दिनों के लिए पूरी तरह बंद रखने यानी 'ब्लैकआउट पीरियड' के प्रावधान पर भी राज्यों ने आपत्ति जताई है, क्योंकि इससे संकट के समय मजदूरों की आजीविका प्रभावित होगी. 


बहरहाल, बिहार, मध्य प्रदेश और झारखंड द्वारा उठाए गए इन वित्तीय सवालों ने साफ कर दिया है कि जब तक केंद्र सरकार इस 60:40 के फंडिंग फॉर्मूले की समीक्षा नहीं करती, तब तक ग्रामीण भारत में रोजगार की इस नई गारंटी को पूरी तरह सफल बना पाना एक बड़ी चुनौती होगी.

यह खबर शेयर करें: WhatsApp Facebook
CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP